*यह पंक्ति पहली नज़र में किताबों के विरुद्ध एक विद्रोह-सी लगती है। मानो जीवन का सारा ज्ञान पुस्तकालयों में नहीं, बल्कि पथरीली राहों पर बिखरा पड़ा हो। पर जब हम गहराई से सोचते हैं, तो समझ आता है कि यह किताबों का अपमान नहीं, बल्कि अनुभवों की महिमा का स्वीकार है। मनुष्य अक्सर वर्षों तक सिद्धांत पढ़ता है, पर एक छोटी-सी ठोकर उसे वह सिखा देती है जो सैकड़ों पन्ने नहीं सिखा पाते।
*किताबें हमें दिशा देती हैं, पर रास्ता हमें स्वयं तय करना पड़ता है। हम इतिहास पढ़ते हैं, दर्शन समझते हैं, नैतिकता के सिद्धांत रटते हैं—पर जब जीवन की आंधी चलती है, तब पता चलता है कि पढ़ा हुआ ज्ञान कितना भीतर उतरा है। असफलता का एक क्षण, अपमान का एक वाक्य, या विश्वासघात की एक घटना हमें झकझोर देती है। वही ठोकर हमारे अहंकार को तोड़ती है, हमें भीतर से नया बनाती है।
*बचपन में हम सुनते हैं—“मेहनत का फल मीठा होता है।” यह एक वाक्य है, एक पाठ है। पर जब हम किसी परीक्षा में असफल होते हैं, किसी प्रतियोगिता में हारते हैं, या किसी प्रिय व्यक्ति को खो देते हैं, तब यह वाक्य केवल शब्द नहीं रहता; वह अनुभूति बन जाता है। ठोकर हमें सिखाती है कि धैर्य क्या होता है, संघर्ष क्या होता है, और आत्मबल किसे कहते हैं।
*जीवन का विद्यालय बड़ा विचित्र है। यहाँ पहले परीक्षा होती है, बाद में पाठ पढ़ाया जाता है। किताबें हमें बताती हैं कि आग जलाती है; पर जब हम स्वयं जलते हैं, तब समझते हैं कि जलन का अर्थ क्या है। किताबें कहती हैं कि समय अनमोल है; पर जब हम समय गँवा देते हैं और अवसर हाथ से निकल जाता है, तब उसका मूल्य समझ में आता है।
*कभी-कभी लगता है कि पढ़ाई में बिताए वर्ष व्यर्थ गए। डिग्रियाँ हाथ में हैं, पर अनुभव की कमी है। पर सच यह है कि किताबें आधार हैं और ठोकरें निर्माण की प्रक्रिया। यदि केवल ठोकरें हों और कोई बुनियादी समझ न हो, तो व्यक्ति टूट सकता है। और यदि केवल किताबें हों, अनुभव न हो, तो व्यक्ति खोखला रह सकता है। जीवन की परिपक्वता दोनों के संतुलन में है।
*ठोकरें हमें विनम्र बनाती हैं। जब सब कुछ अनुकूल होता है, तब हम स्वयं को सर्वज्ञ समझने लगते हैं। सफलता का नशा चढ़ जाता है। पर एक असफलता हमें जमीन पर ला देती है। वह अहंकार को चूर करती है, हमें दूसरों के दर्द को समझने की दृष्टि देती है। शायद इसीलिए कहा जाता है कि जिसने दर्द नहीं झेला, वह करुणा को नहीं समझ सकता।
*आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो ठोकरें ईश्वर का संकेत भी हो सकती हैं। जब हम गलत दिशा में बढ़ते हैं, तो कोई बाधा हमें रोकती है। वह बाधा कष्टदायक होती है, पर अंततः हमारे हित में होती है। कई बार जिस घटना को हम दुर्भाग्य समझते हैं, वही भविष्य का वरदान बन जाती है। यदि किसी नौकरी से निकाले न जाते, तो शायद अपना मार्ग न खोज पाते। यदि किसी रिश्ते में धोखा न मिलता, तो शायद आत्मसम्मान का मूल्य न समझते।
*किताबें हमें दूसरों के अनुभवों से परिचित कराती हैं। वे हमें चेतावनी देती हैं, प्रेरणा देती हैं, दिशा दिखाती हैं। पर ठोकरें हमारे अपने अनुभव हैं। वे व्यक्तिगत होती हैं, गहरी होती हैं। उनका दर्द भी अपना होता है, और उनसे निकला प्रकाश भी। जब हम गिरते हैं, तब समझते हैं कि उठना क्या होता है। जब हम टूटते हैं, तब जान पाते हैं कि भीतर कितनी शक्ति छिपी है।
*समाज में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ महान व्यक्तियों ने असफलताओं से ही सीख ली। वैज्ञानिकों के असंख्य प्रयोग विफल हुए, तब जाकर एक सफलता मिली। कलाकारों की रचनाएँ अस्वीकृत हुईं, तब जाकर पहचान बनी। हर सफलता के पीछे असफलताओं का लंबा इतिहास छिपा होता है। यह इतिहास किताबों में संक्षेप में दर्ज होता है, पर उस व्यक्ति के जीवन में वह विस्तृत पीड़ा और संघर्ष के रूप में जीया गया होता है।
*इस पंक्ति का सार यह नहीं कि किताबें व्यर्थ हैं। बल्कि यह है कि केवल पुस्तकीय ज्ञान पर्याप्त नहीं। जीवन की पाठशाला में ठोकरें अनिवार्य हैं। वे हमें आत्मचिंतन सिखाती हैं। वे हमें यह बताती हैं कि वास्तविक शक्ति भीतर है, बाहरी उपलब्धियों में नहीं।
*जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि जिन क्षणों को हमने सबसे कठिन माना था, वही हमारे व्यक्तित्व के निर्माण के आधार बने। जिस असफलता पर हमने आँसू बहाए थे, वही हमारे धैर्य की परीक्षा थी। जिस अपमान से हम टूट गए थे, वही हमारे आत्मसम्मान का आरंभ था।
*अंततः जीवन एक संगम है—ज्ञान और अनुभव का। किताबें हमें प्रकाश देती हैं, ठोकरें हमें दिशा। किताबें हमें सोचने की क्षमता देती हैं, ठोकरें हमें जीने की समझ। यदि दोनों का संतुलन हो, तो मनुष्य परिपक्व बनता है।
*इसलिए शायद यह कहना अधिक उचित होगा—
वक़्त किताबों में ज़ाया नहीं हुआ,
बल्कि ठोकरों ने उन किताबों को अर्थ दे दिया।
*जीवन की राह में गिरना भी आवश्यक है, क्योंकि गिरकर ही हम उठना सीखते हैं। और जब उठते हैं, तो पहले से अधिक सजग, अधिक संवेदनशील और अधिक मजबूत होकर उठते हैं। यही जीवन का सच्चा पाठ है—जो शब्दों से नहीं, अनुभवों से लिखा जाता है।
पुस्तकों से हम आदर्शवाद और नैतिकता सीखते हैं जबकि ठोकरें हमें समाज और जमाने में मौजूद हकीकत के आईने से रूबरू करवाती है।
संकलनकर्ता हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966
