कब तक जलाओगे नारी को,
किस परंपरा के नाम पर?
कब तक दोगे आग की शिक्षा
त्यौहारों के काम पर?
एक स्त्री की प्रतिमा जलती है,
और हम ताली बजाते हैं,
फिर कहते हैं — नारी पूज्य है,
कैसे ये वचन निभाते हैं?
क्या ये सती की छाया नहीं?
क्या ये दहेज का रूप नहीं?
जब-जब नारी अग्नि में सौंपी जाए,
वो उत्सव का स्वरूप नहीं।
इतिहास के पन्नों में देखो,
कितना अन्याय सहा गया,
कभी सती, कभी पर्दा, कभी बंधन,
नारी को सीमित रखा गया।
कुछ ग्रंथों की कठोर व्याख्या ने
उसको अधिकारों से दूर किया,
मनुष्य होकर भी मनुष्य न मानी,
जीवन उसका मजबूर किया।
और आज भी जब होलिका जलती,
एक संदेश कहीं जाता है —
“नारी जल सकती है फिर भी”,
मन में डर दोहराता है।
मैं पूछती हूँ समाज से —
क्या बुराई सचमुच स्त्री है?
या वह सोच जो उसको जलाए,
वही असली अधर्मी है?
त्यौहार प्रेम का प्रतीक बने,
नारी-दहन का नहीं,
बसंत रंगों से महके,
आग के कफन का नहीं।
बहनों, अब जागो, सोचो,
प्रतीकों को पहचानो,
जो छवि तुम्हें ही जलाती हो,
उसको मिलकर ठुकराओ।
होली रंगों की हो, सम्मान की हो,
बराबरी के अधिकार की हो,
नारी की चेतना जागृत हो,
नई सोच के उद्गार की हो।
अब समय है ये कहने का —
नारी को जलाना बंद करो!
त्यौहारों में छिपे अन्याय का
मौन समर्थन बंद करो!
अज्ञात की कलम से ✒️
