“डुबती हुई स्वर्ण संस्कृति”
बड़ों का सम्मान डुब गया,
बच्चों का प्यार डुब गया,
बहू का घूंघट डुब गया,
सांस की लज्जा डुब गई,
हमारी स्वर्ण संस्कृति डुब गई,
पाश्चय संस्कृत उबर गई।।

व्यक्ति का चरित्र डुब गया,
अतिथि का सत्कार डुब गया,
भाई का कर्तव्य डुब गया,
बहन की राखी डूब गई,
हमारी स्वर्ण संस्कृति डूब गई,
पाश्चाय संस्कृति उबर गई।।
बड़ों का सानिध्य डुब गया,
बच्चों के संस्कार डुब गये,
हमारा सुनहरा इतिहास डुब गया,
बहन- बेटी की मर्यादा डुब गई,
हमारी स्वर्ण संस्कृति डुबी गई,
पाश्चाय संस्कृति उबर गई।।
स्त्री के गहने डुब गये,
वीरों की तलवारे डुब गई,
देवर की हद (सीमा)डूब गई,
भाभी की मर्यादा डुब गई,
हमारी स्वर्ण संस्कृति डुब गई,
पाश्चाय संस्कृति उबर गई।।
-देवी सिंह राजपूत
अचलपुर
