वर्तमान समय में समाज और राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आज हर वर्ग, हर जाति और हर समुदाय अपने हितों की सुरक्षा और विस्तार के लिए अवसरों की खोज में है। किसी की पार्टी नहीं, किसी का संगठन नहीं और किसी का क्षेत्र नहीं—जहाँ थोड़ा सा भी लाभ दिखता है, वहीं लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से नहीं हिचकते। जाट, माली, गुर्जर, विश्नोई, चारण जैसे समाज इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। ये समाज स्वयं आरक्षित वर्ग में होते हुए भी राजनीतिक और सामाजिक लाभ के लिए सामान्य वर्ग द्वारा संचालित संस्थाओं, संगठनों और दलों में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं और उसी के दम पर उन्होंने अपना वर्चस्व स्थापित किया है। इसके ठीक विपरीत, मेघवाल समाज की स्थिति चिंताजनक है। समाज के पढ़े-लिखे, योग्य और जागरूक लोग पिछले लगभग 70 वर्षों से एक ही पार्टी और एक ही संगठन तक सीमित होकर रह गए हैं। जब अन्य दलों या संगठनों में जुड़ने का अवसर आता है या आग्रह किया जाता है, तब यह कहकर पीछे हट जाते हैं कि हमारे पूर्वज तो हमेशा से इसी पार्टी और इसी संगठन से जुड़े रहे हैं, इसलिए हम दूसरी जगह नहीं जा सकते। यह सोच आज के समय में सबसे बड़ी बाधा बन चुकी है। हकीकत यह है कि कोई भी यह नहीं कहता कि आप अपने संगठन को छोड़कर किसी और संगठन में शामिल हो जाएँ। बात केवल इतनी है कि समाज की उपस्थिति हर मंच पर होनी चाहिए। अनुसूचित जाति वर्ग की कई ऐसी जातियाँ, जिनकी जनसंख्या नगण्य है, उन्होंने इसी रणनीति को अपनाया। वे अलग-अलग राजनीतिक दलों, सामाजिक और धार्मिक संगठनों में शामिल हुए और धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत की।परिणामस्वरूप आज उनकी आवाज़ सुनी जाती है, उनका प्रभाव प्रशासन तक दिखाई देता है और वे अपने समाज के लिए बेहतर परिणाम निकाल पाने में सफल हो रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि मेघवाल समाज को आज भी “जन्मजात कांग्रेस समर्थक” या केवल “अंबेडकर संगठन का कार्यकर्ता” मान लिया गया है। यह छवि समाज की संभावनाओं को सीमित कर देती है। जब किसी समाज को एक ही खांचे में बंद कर दिया जाता है, तो सत्ता और प्रशासन दोनों उसे विकल्पहीन मान लेते हैं। यही कारण है कि हमारी जायज़ मांगें भी अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। अब समय आ गया है कि मेघवाल समाज गंभीरता से आत्ममंथन करे। समाज का व्यक्ति हर राजनीतिक दल में होना चाहिए—सत्ता पक्ष में भी और विपक्ष में भी। हर सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक संगठन में हमारी भागीदारी होनी चाहिए। इससे चाहे किसी भी दल की सरकार बने, हमारी समाज की उपस्थिति, प्रभाव और वर्चस्व बना रहेगा। प्रशासनिक कार्यालयों में भी हमारा काम सहजता से हो सकेगा, क्योंकि वहाँ हमें केवल याचक नहीं, बल्कि हिस्सेदार के रूप में देखा जाएगा। यदि आज भी हम इसी पुरानी सोच में उलझे रहे, तो आने वाला समय और भी कठिन होगा। नगण्य जनसंख्या वाली अन्य अनुसूचित जातियाँ संगठित होकर आगे बढ़ती जाएँगी और हमारा सामाजिक व राजनीतिक दमन होता चला जाएगा। इसलिए यह केवल सलाह नहीं, बल्कि समय की माँग है कि मेघवाल समाज अपनी सोच बदले, दायरा बढ़ाए और हर मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराए। समाज तभी आगे बढ़ता है जब वह अवसरों को पहचानता है, डर को त्यागता है और भविष्य की राजनीति को समझकर कदम उठाता है। आज निर्णय का समय है—या तो हम इतिहास में पीछे छूटते रहेंगे, या फिर जागरूक होकर अपना हक़ और सम्मान स्वयं सुनिश्चित करेंगे।

✍️ गणपत मेघवाल, सामाजिक कार्यकर्ता, नाड़सर ,भोपालगढ

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