भूमिका :

सदियों से दबाए गए दिमाग़ और आज का सबसे बड़ा धोखा
अनुसूचित जाति और जनजाति समाज सदियों से ज़िल्लत (अपमान), जलालत (बेइज्जती) और जहालत (अज्ञान) की मार झेलता आया है। इस समाज को कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर, तो कभी सुपरस्टिशन (अंधविश्वास) के ज़रिये पीछे रखा गया। आज जब दुनिया टेक्नोलॉजी( तकनीक), इकॉनमी (अर्थव्यवस्था) और नॉलेज ( ज्ञान) से आगे बढ़ रही है, तब हमारा समाज अभी भी बाबा, चमत्कार और डर के सहारे जी रहा है। यही सबसे बड़ा ख़तरा है।

इंदौर में मंदिर में किसी बीमार कुत्ते की पूजा होने लगे या खरगोश के आकर के डस्टबिन पर चढ़ावा चढ़ाया जाए, यह सिर्फ इल्यूजन (भ्रम)नहीं बल्कि हमारे बौद्धिक पिछड़े वन का प्रतीक है और आस्था (ईमान – विश्वास) नहीं बल्कि माइंड-कंट्रोल (मानसिक नियंत्रण) की साज़िश है। यह वही सोच है जो सदियों से अनुसूचित जाति और जनजाति समाज को जहालत (अज्ञान) में रखकर उसके ज़ेहन (मस्तिष्क) पर क़ब्ज़ा किए हुए है। बाबाओं की पूरी फ़ौज आज साइंटिफिक टेंपरामेंट (वैज्ञानिक सोच) की क़त्लगाह बनी हुई है, जहाँ सवाल पूछना गुनाह समझा जाता है और तर्क को कुफ़्र (अपराध) कह दिया जाता है।अंधविश्वास, बाबाओं की कृपा पर निर्भरता और पुरानी प्रथाएँ हमारी सोच को जकड़ रही हैं। ऐसे में जरूरी है कि हम समझें—देश का भविष्य केवल तकनीकी शक्ति, अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति से सुरक्षित रहेगा।

एससी–एसटी समाज स्वभाव से इमोशनल (भावुक) रहा है, क्योंकि उसने हमेशा ज़ुल्म (अत्याचार) और अभाव झेले हैं। इसी कमज़ोरी को पहचानकर पाखंडी लोग उसे डर, चमत्कार और झूठी उम्मीदों के जाल में फँसाते हैं। बीमारी को दुआ (प्रार्थना) और पूजा से जोड़ देना इस समाज को हेल्थ-केयर (स्वास्थ्य देखभाल) और साइंस (विज्ञान) से दूर कर देता है।
सच यह है कि बीमारी का इलाज अस्पताल में होता है, पूजा-पाठ में नहीं। यह बात समझना ही आज़ादी (फ़्रीडम – स्वतंत्रता) की पहली सीढ़ी है। जब तक एससी–एसटी समाज सुपरस्टिशन (अंधविश्वास) से बाहर नहीं आएगा, तब तक शोषण करने वाले लोग उसे यूज़ (उपयोग) करते रहेंगे। जागरूकता ही वह ताक़त है जो इस बंद दरवाज़े को खोल सकती है।दुनिया के विकसित देश अपने युवा को रिसर्च ग्रांट (अनुसंधान अनुदान) और तकनीकी शिक्षा दे रहे हैं। वहीं हमारे समाज के बच्चे अभी भी जाति, धर्म और पुरानी प्रथाओं में उलझे हैं।

धर्म की राजनीति का सबसे कड़वा सच यह है कि इसका मोहरा अक्सर वही बनता है जो पहले से ही दबा-कुचला है—अनुसूचित जाति और जनजाति का समाज। धर्म आज स्पिरिचुअल (आध्यात्मिक) साधना नहीं रहा, बल्कि एक पॉलिटिकल (राजनीतिक) टूल में बदल चुका है, जिसका इस्तेमाल सत्ता, वोट और वर्चस्व के लिए किया जा रहा है।

विडंबना यह है कि जो दल और विचारधाराएँ कल तक धर्म को पिछड़ेपन का प्रतीक बताती थीं, आज वही लोग धर्मगुरुओं के मंच साझा कर रहे हैं। यह खुली हिपोक्रेसी (पाखंड) है। इस पूरे खेल में एससी–एसटी समाज को केवल वोट-बैंक समझा जाता है, नीति-निर्माण में भागीदार नहीं। उनकी आस्था को भड़काया जाता है, भावनाओं को उकसाया जाता है और बदले में उन्हें केवल प्रतीकात्मक सम्मान दिया जाता है।

तथाकथित संतों और बाबाओं में न शील है, न क्षमा, न करुणा—सिर्फ़ ईगो (घमंड) है। वे सामाजिक बराबरी, शिक्षा और अधिकारों की बात नहीं करते, क्योंकि जागरूक समाज उनके प्रभाव को चुनौती देता है।

आज ज़रूरत है कि एससी–एसटी समाज धर्म और राजनीति के इस गठजोड़ को समझे। सच्ची मुक्ति अंधभक्ति से नहीं, बल्कि शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक अधिकारों की समझ से आएगी। जब समाज सवाल करना सीखेगा, तभी वह मोहरा नहीं, निर्णायक बनेगा।

भविष्य विज्ञान से बचेगा, चमत्कार से नहीं
आज दुनिया इल्म (ज्ञान) और साइंस (विज्ञान) के ज़रिये अपनी तक़दीर बदल रही है। चीन यूनिवर्सिटी में इन्वेस्टमेंट (निवेश) कर रहा है, रिसर्च-लैब बना रहा है, जबकि हम अब भी ग्रंथ-पाठ पर ताली बजाकर खुद को मोतीवेटेड (प्रेरित) समझ लेते हैं। यह फ़र्क़ ही आने वाले कल की डायरेक्शन (दिशा) तय करेगा।
सुरक्षित भविष्य टेक्नोलॉजी (तकनीक), न्यूक्लियर एनर्जी (नाभिकीय ऊर्जा) और डिफेंस (रक्षा) से बनेगा, न कि चमत्कार और अफ़वाहों से। साइंस सवाल करना सिखाती है, जबकि अंधविश्वास सिर्फ़ सबमिशन (आज्ञाकारिता) पैदा करता है।
एससी–एसटी समाज के बच्चों को अब सिर्फ़ डिग्री पर नहीं, बल्कि स्किल (कौशल), रिसर्च (अनुसंधान) और ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) पर फोकस करना होगा। यही रास्ता उन्हें एम्पावरमेंट (सशक्तिकरण) की ओर ले जाएगा।
डिग्री तभी मायने रखती है जब उसके साथ क़ाबिलियत हो, वरना वह सिर्फ़ एक डॉक्यूमेंट (काग़ज़) बनकर रह जाती है। अगर आज एससी–एसटी समाज इल्म, साइंस और स्किल चुनेगा, तो कल कोई ताक़त उसे मार्जिनल (हाशिये पर) नहीं रख पाएगी।

समापन : अगर अब भी नहीं जागे, तो इतिहास दोहराया जाएगा

यह लेख धर्म के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि ज़ेहनी ग़ुलामी (मानसिक दासता) के ख़िलाफ़ है। आस्था अगर इंसान को सोचने से रोके, सवाल पूछने से डरे, तो वह आस्था नहीं, माइंड-कंट्रोल (मानसिक नियंत्रण) बन जाती है। अगर एससी–एसटी समाज आज भी अंधविश्वास, बाबाओं और भावुक नारों को चुनेगा, तो आने वाला वक्त वही पुरानी ज़िल्लत (अपमान) दोहराएगा, जिससे निकलने में सदियाँ लगी हैं।

लेकिन विकल्प हमारे पास है। अगर हमने तालीम (शिक्षा), साइंस और सेल्फ-रिलायंस (आत्मनिर्भरता) को चुना, तो कोई भी व्यवस्था हमें मार्जिनल (हाशिये पर) नहीं रख पाएगी। यह लेख किसी के ख़िलाफ़ चार्जशीट (आरोप-पत्र) नहीं, बल्कि अपने लोगों के लिए अलार्म (चेतावनी) है।

अब समय आ गया है कि अनुसूचित जाति और जनजाति समाज अंधविश्वास की ज़ंजीर तोड़े और अपनी असली ताक़त—हुनर और सोच—को पहचाने। अगर हम जागरूक नहीं हुए, तो मनुवादी और सत्ता पर क़ाबिज़ लोग फिर से हमारा एक्सप्लॉइटेशन (शोषण) करेंगे।

डरिए नहीं, मगर अलर्ट (सतर्क) ज़रूर रहिए। हर बच्चा स्किल (कौशल), थिंकिंग (सोच) और साइंटिफिक-टेम्परामेंट (वैज्ञानिक दृष्टि) के दम पर आगे बढ़े। तभी हमारा समाज प्रॉस्पेरिटी (खुशहाली), सिक्योरिटी (सुरक्षा) और सम्मान हासिल कर पाएगा।

संकलन कर्ता हगामी लाल
मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 982923 0966

स्रोत और संदर्भ:
अजय एसएन सिंह की फेसबुक से प्रेरित एवं
सामाजिक चिंतन लेख, शिक्षा व कौशल पर सरकारी रिपोर्टें, वैज्ञानिक सोच संबंधी संवैधानिक मूल्य, एससी–एसटी समाज के अनुभवजन्य अध्ययन।

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