भारत की मासूम जनता को कैसे भरोसा दिलाकर पागल बना कर सत्ता का सुख भोगने का साधन बनाया ?
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सवाल पूछने की आज़ादी और जवाबदेही की संस्कृति से जीवित रहता है। जब कोई सत्ता बार-बार एक ही नारा दोहराकर जनता की स्मृति पर कब्ज़ा कर ले, तब वह नारा इतिहास नहीं, बल्कि नैरेटिव (कथा-निर्माण) बन जाता है।
“सत्तर साल की लूट” भी ऐसा ही एक जुमला था—जो न अदालत का निष्कर्ष था, न किसी जांच एजेंसी की रिपोर्ट, बल्कि एक पूंजीवाद और दक्षिण पंथ का एक सियासी राजनीतिक अभियान था। इस लेख का उद्देश्य उसी अभियान की परतें खोलना है, ताकि भावनाओं के शोर में दबे तथ्यों को फिर से देखा जा सके।
1–“सत्तर साल की लूट” : एक गढ़ा हुआ नैरेटिव और लोकतांत्रिक स्मृति पर हमला
सत्य का पहला शत्रु अक्सर झूठ नहीं होता, बल्कि वह अधूरा सच होता है जिसे बार-बार दोहराकर पूर्ण सत्य का रूप दे दिया जाता है। और इसमें सांप्रदायिक और दक्षिणपंथी लोगों को महारथ हासिल है “सत्तर साल की लूट” भी ऐसा ही एक नैरेटिव (कथा-निर्माण) था, जिसे किसी अदालत के फैसले, किसी संवैधानिक संस्था की रिपोर्ट या किसी आधिकारिक जांच का आधार प्राप्त नहीं था। इसके बावजूद इसे इस तीव्रता से तथाकथित दक्षिणपंथी पूंजीवादियों द्वारा दोहराया गया कि धीरे-धीरे यह इतिहास का निष्कर्ष प्रतीत होने लगा। दर्शन में इस प्रक्रिया को कंडीशनिंग (मानसिक अभ्यस्तता) कहा जाता है, जहाँ विवेकशील चिंतन के स्थान पर स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया जन्म ले लेती है।
लोकतंत्र में स्मृति केवल अतीत का बोझ नहीं होती, वह नागरिक चेतना की बुनियाद होती है। जब उसी स्मृति पर योजनाबद्ध ढंग से हमला किया जाए, तब जनता सवाल पूछने के बजाय उत्तर स्वीकार करने लगती है। दो जांच समितियों का गठन—एक न्यायिक और दूसरी राजनीतिक—इसी स्वीकार्यता को वैधता देने का माध्यम था। जनता को यक़ीन
दिलाया गया कि अब तथ्यों की रोशनी में इंसाफ़ होगा। किंतु जब न कोई अंतिम रिपोर्ट सामने आई, न किसी नाम पर कार्यवाही हुई, न किसी संपत्ति की जब्ती, तब यह स्पष्ट हो गया कि यहाँ न्याय नहीं, बल्कि मासूम भारतीय जनता के भरोसे का इस्तेमाल किया गया।
यह स्थिति किसी प्रशासनिक विफलता का परिणाम नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी डिज़ाइन (पूर्व नियोजित संरचना) जो पूंजीवादियों और दक्षिण पंथी द्वारा की गई संरचना का हिस्सा थी। इस डिज़ाइन का उद्देश्य सत्य की तलाश नहीं, बल्कि जनता को एक स्थायी जवाब थमा देना था—ताकि हर वर्तमान प्रश्न को अतीत के एक जुमले से दबाया जा सके। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतांत्रिक स्मृति पर हमला होता है और नागरिक धीरे-धीरे विस्तार में जाने की बजाय सतही संतोष में फँस जाता है।
इस तरह “सत्तर साल की लूट” इतिहास नहीं बनी, बल्कि एक सियासी (राजनीतिक) औज़ार बनकर लोकतंत्र की चेतना को कुंद करने का माध्यम बन गई।
2–आंदोलन से सौदे तक : माफ़ी, मौन और नैतिक राजनीति का पतन
राजनीतिक नैतिकता का एक बुनियादी सिद्धांत है कि जहाँ प्रमाण मौजूद हों, वहाँ माफ़ी नहीं बल्कि दंड होता है। इसी सिद्धांत की पुष्टि लालकृष्ण आडवाणी द्वारा सोनिया गांधी से की गई सार्वजनिक माफ़ी में दिखाई देती है। यह माफ़ी केवल एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि पूरे “सत्तर साल की लूट” नैरेटिव (कथा-निर्माण) से की गई माफ़ी थी। दार्शनिक दृष्टि से यह उस कथा की इंतिहा (समाप्ति) थी।
लेकिन लोकतंत्र का संकट तब गहराता है, जब मृत सत्य को भी जनता की स्मृति से जानबूझकर हटा दिया जाता है।
2010–14 के दौरान काला धन आंदोलन हर मंच पर जीवित था, पर सत्ता मिलने के बाद उसका अचानक लुप्त हो जाना यह प्रश्न उठाता है कि क्या यह आंदोलन कोई मक़सद (उद्देश्य) था या मात्र सत्ता तक पहुँचने का साधन।
बाबा रामदेव का प्रसंग यहाँ किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि एक मोरल ट्रांसफॉर्मेशन (नैतिक रूपांतरण) का संकेत है। साधना और त्याग की भाषा से सत्ता, संरक्षण और विस्तार की भाषा तक का यह संक्रमण बताता है कि जब आंदोलन सत्ता से समझौता कर लेता है, तो वह आंदोलन नहीं रहता—वह एक डील (सौदा) बन जाता है।
3–कौवा, कान और कॉरपोरेट राज : ध्यान-भ्रम और मित्र अर्थव्यवस्था का दर्शन?
भारतीय लोककथा का “कौवा कान ले गया” केवल एक बाल-कहानी नहीं है, बल्कि सत्ता के मनोविज्ञान (साइकोलॉजी – मानसिक प्रक्रिया) को समझने का सशक्त रूपक है। इसका आशय यह है कि जब जनता का ध्यान तथाकथित पूंजीवादियों और सांप्रदायिक लोगों द्वारा एक झूठे शोर की ओर मोड़ दिया जाता है, तब वह अपने ही हितों को भूलकर उसी शोर के पीछे दौड़ने लगती है। तथाकथित पूंजीवादियों और सांप्रदायिक लोगों की सत्ता इसी ध्यान-भ्रम (डिस्ट्रैक्शन – ध्यान भटकाव) का लाभ उठाती है, क्योंकि वास्तविक परिवर्तन हमेशा शोर में नहीं, बल्कि खामोशी में घटित होते हैं।
झूंटे नॉरेटिव के नारे“सत्तर साल की लूट” का शोर जब चरम पर था, उसी समय देश की सार्वजनिक संपत्तियों का व्यापक हस्तांतरण हुआ। हवाईअड्डे, बंदरगाह, ऊर्जा संसाधन, कोयला और खनन क्षेत्र, डेटा, टेलीकॉम और रक्षा उत्पादन—सब धीरे-धीरे कुछ चुनिंदा हाथों में केंद्रित होते चले गए। इसे साधारण प्राइवेटाइजेशन (निजी हाथों में सौंपना) कहना सच्चाई को अधूरा बताना होगा। वास्तव में यह क्रोनी कैपिटलिज़्म (मित्र-आधारित पूँजीवाद) का संस्थानीकरण था, जहाँ सत्ता और पूँजी के बीच की दूरी समाप्त हो गई।
ऋण माफी, कॉरपोरेट कर-छूट और पीएलआई योजनाओं ने मिलकर ऐसी अर्थव्यवस्था रची, जिसमें लाभ निजी हो गया और जोखिम सार्वजनिक। आम नागरिक पर महँगाई, बेरोज़गारी और असुरक्षा का बोझ बढ़ता गया, जबकि कुछ चुनिंदा समूहों (दो पूंजीपतियों) के लिए अवसरों के दरवाज़े खुलते चले गए। जब हिंडनबर्ग जैसी रिपोर्टों ने गंभीर सवाल उठाए, तब सत्ता की ख़ामोशी यह बताने के लिए पर्याप्त थी कि समस्या तथ्यों की नहीं, बल्कि जवाबदेही की है।
यह स्थिति जनता की मूर्खता का परिणाम नहीं थी। यह जनता के भरोसे पर किया गया एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिकल) प्रयोग था, जिसमें एक वाक्य को हर सवाल का उत्तर बना दिया गया। जब लोग रुके और पीछे मुड़कर देखा, तो उन्हें एहसास हुआ कि कौवा कभी कान ले गया ही नहीं था—लेकिन इस बीच पूरा निज़ाम (तंत्र) बदल चुका था।
समापन
कौवा कभी कान ले गया ही नहीं था।
लेकिन जब तक जनता उसके पीछे दौड़ती रही, तब तक रोज़गार चला गया, संपत्ति चली गई और जवाबदेही भी।
“सत्तर साल की लूट” न इतिहास था, न जांच, न न्याय।
वह एक रिकॉर्ड-विहीन राजनीतिक ऑपरेशन था—जिसका उद्देश्य तथाकथित पूंजीवादियों और सांप्रदायिक लोगों के सत्ता पाना, आंदोलन समाप्त करना और मित्र अर्थव्यवस्था (क्रॉनिक कैपिटल) खड़ी करना था।
इतिहास नारों से नहीं लिखा जाता।
वह रिकॉर्ड, स्मृति और जवाबदेही से लिखा जाता है।
और अब समय आ गया है कि इस झूठ को भावनाओं से नहीं, बल्कि उसके सबसे बड़े अभाव—सबूत की अनुपस्थिति—से हमेशा के लिए उजागर किया जाए। और यह कौन करेगी मेरे वतन भारत की जनता। अगर उत्तर ना में है तो फिर इसी भुलावे में जीते रहे जिसके वे हकदार हैं।
संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिकचिंतक ।
स्रोत और संदर्भ
शशिकांत सिंह की फेसबुक पोस्ट; काला धन जांच समितियों से जुड़ी सार्वजनिक जानकारियाँ; आडवाणी–सोनिया गांधी माफ़ी संबंधी अभिलेख; निजीकरण, ऋण माफी, कॉरपोरेट नीति व हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर आधारित मीडिया विश्लेषण।
