भूमिका
भारत का बहुजन वंचित समाज सदियों से सामाजिक उपेक्षा, आर्थिक निर्भरता और मानसिक गुलामी का बोझ उठाता आया है। कथित उच्च वर्गों के व्यवहार ने उसके भीतर हीनता और भय का वातावरण पैदा किया, जिसके कारण वह अपने सुख-दुख का आधार दूसरों को मानने लगा। यही मानसिकता उसे आत्मनिर्भर बनने से रोकती है। जब कोई व्यक्ति अपनी खुशियों की चाबी दूसरों के हाथ में दे देता है, तब वह सम्मान खो देता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि बहुजन समाज स्वयं को पहचाने, अपनी ताकत को समझे और आत्मविश्वास के साथ जीवन जीना सीखे। तभी सामाजिक समानता और वास्तविक स्वतंत्रता संभव हो सकेगी।
मनुष्य को अपने परिवार, माता-पिता और रिश्तों से प्रेम अवश्य करना चाहिए, क्योंकि वही जीवन की पहली पाठशाला होते हैं। लेकिन अत्यधिक भावनात्मक निर्भरता व्यक्ति को भीतर से कमजोर बना देती है। माता-पिता और परिवार भी जीवन के मुसाफिर हैं, वे हमेशा साथ नहीं रह सकते। इसलिए व्यक्ति को अपने भीतर आत्मस्वीकार और आत्मनिर्भरता विकसित करनी चाहिए। यदि इंसान स्वयं को अपनाना सीख जाए, तो अकेलापन उसे तोड़ नहीं पाता। अपने अस्तित्व को पहचानना और स्वयं का सहारा बनना मानसिक मजबूती की सबसे बड़ी निशानी है। आत्मप्रेम स्वार्थ नहीं, बल्कि संतुलित और सम्मानपूर्ण जीवन जीने की आधारशिला है।
बहुजन वंचित समाज का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अपनी खुशियों का केंद्र दूसरों को बना लेता है। कथित स्वर्ण समाज के व्यवहार ने वर्षों तक उसे यह महसूस कराया कि उसका अस्तित्व दूसरों की कृपा पर टिका है। इसी कारण वह हर समय किसी सहारे की तलाश में रहता है। जबकि सच्चाई यह है कि इंसान की सबसे बड़ी शक्ति उसका आत्मविश्वास होता है। यदि व्यक्ति स्वयं से प्रेम करना सीख जाए तो कोई उसे मानसिक रूप से कमजोर नहीं बना सकता। समाज को चाहिए कि वह अपने भीतर की तहज़ीब (संस्कार) को पहचाने और जीवन में कॉन्फिडेंस (आत्मविश्वास) पैदा करे।
कई बार बहुजन समाज के लोग दूसरों की स्वीकृति पाने के लिए अपने विचार और आत्मसम्मान तक छोड़ देते हैं। यह मानसिक दासता उन्हें भीतर से कमजोर करती है। जो समाज अपने निर्णय स्वयं नहीं ले पाता, वह हमेशा दूसरों के नियंत्रण में रहता है। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नहीं होती, बल्कि मानसिक भी होती है। यदि व्यक्ति अपने दुख और सुख का कारण खुद बन जाए तो कोई उसे अपमानित नहीं कर सकता। जीवन में इज़्ज़त (सम्मान) वही पाता है जो स्वयं को योग्य समझता है। इसलिए हर व्यक्ति को अपनी पर्सनैलिटी (व्यक्तित्व) मजबूत करनी चाहिए।
बहुजन समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अक्सर दूसरों के व्यवहार से अपने मूल्य का निर्धारण करता है। यदि कोई उसकी प्रशंसा करे तो खुश और आलोचना करे तो दुखी हो जाता है। यह स्थिति मानसिक निर्भरता को जन्म देती है। जबकि जीवन का सत्य यह है कि हर व्यक्ति एक मुसाफिर है और कोई हमेशा साथ नहीं रहता। इसलिए दूसरों पर अत्यधिक निर्भर होना दुख का कारण बनता है। व्यक्ति को अपने भीतर की सबर (धैर्य) शक्ति को बढ़ाना चाहिए और अपनी कैपेसिटी (क्षमता) को पहचानना चाहिए।
समाज में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ बहुजन वर्ग के लोग केवल इसलिए पीछे रह गए क्योंकि उन्होंने स्वयं को कमतर समझ लिया। कथित ऊँची जातियों के कुछ लोगों का व्यवहार उन्हें यह अहसास कराता रहा कि वे नेतृत्व के योग्य नहीं हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब बहुजन समाज ने आत्मसम्मान के साथ संघर्ष किया, तब उसने नई दिशा दी। व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी हिम्मत (साहस) बनाए रखे और अपने भीतर की एनर्जी (ऊर्जा) को सकारात्मक कार्यों में लगाए।
दूसरों को अपनी आदत बना लेना भी बड़ी कमजोरी है। जब व्यक्ति किसी इंसान को अपनी खुशी का केंद्र बना लेता है, तब उसके जाने पर जीवन खाली लगने लगता है। यही स्थिति बहुजन समाज में भी दिखाई देती है, जहाँ लोग सामाजिक स्वीकृति के लिए संघर्ष करते रहते हैं। जबकि सच्चा सुख आत्मनिर्भरता में है। इंसान को खुद का साथी बनना सीखना चाहिए। अपने भीतर की मोहब्बत (प्रेम) को जगाइए और अपनी स्किल (कौशल) को विकसित कीजिए, तभी आत्मबल मजबूत होगा।
बहुजन समाज के युवाओं को यह समझना होगा कि केवल भावनात्मक सहारे से जीवन नहीं बदलता। शिक्षा, आत्मसम्मान और संघर्ष ही वास्तविक परिवर्तन के साधन हैं। यदि युवा हर समय दूसरों से उम्मीद लगाए बैठा रहेगा तो उसका विकास रुक जाएगा। समाज को अपने बच्चों में आत्मविश्वास और स्वतंत्र सोच विकसित करनी होगी। जीवन में आगे बढ़ने के लिए जुनून (उत्साह) जरूरी है। साथ ही आधुनिक लीडरशिप (नेतृत्व क्षमता) को अपनाना भी समय की मांग है।
बहुजन समाज को सदियों तक यह सिखाया गया कि वह केवल आदेश मानने के लिए बना है। इसी सोच ने उसके भीतर डर पैदा किया। लेकिन आज समय बदल चुका है। संविधान ने समान अधिकार दिए हैं और शिक्षा ने नई चेतना पैदा की है। अब आवश्यकता है मानसिक गुलामी को तोड़ने की। व्यक्ति को अपने भीतर की शऊर (समझ) को जगाना होगा। साथ ही अपने जीवन में मोटिवेशन (प्रेरणा) को बनाए रखना होगा ताकि वह परिस्थितियों से हार न माने।
जीवन में तन्हाई और संघर्ष हर व्यक्ति के हिस्से आते हैं। जो लोग दूसरों पर अधिक निर्भर रहते हैं, वे अकेलेपन से सबसे अधिक टूटते हैं। बहुजन समाज को यह समझना होगा कि उसकी सबसे बड़ी ताकत उसका सामूहिक आत्मविश्वास है। यदि व्यक्ति स्वयं से प्रेम करना सीख जाए तो उसे हर समय सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। आत्मनिर्भरता व्यक्ति को मजबूत बनाती है। इसलिए अपने भीतर की उम्मीद (आशा) को जीवित रखिए और अपनी क्रिएटिविटी (रचनात्मकता) को पहचानिए।
आज सोशल मीडिया और आधुनिक जीवनशैली ने लोगों को भावनात्मक रूप से और अधिक निर्भर बना दिया है। लोग लाइक और प्रशंसा को ही अपनी पहचान मानने लगे हैं। बहुजन समाज के युवाओं को इस भ्रम से बाहर आना होगा। असली सम्मान भीतर से आता है, बाहर से नहीं। व्यक्ति जितना स्वयं को समझेगा, उतना ही मजबूत बनेगा। जीवन में खुलूस (सच्चाई) बनाए रखना आवश्यक है। साथ ही अपनी विजन (दूरदृष्टि) को स्पष्ट रखना भी जरूरी है।
बहुजन वंचित समाज यदि अपनी वास्तविक शक्ति पहचान ले तो उसकी अधिकांश परेशानियां समाप्त हो सकती हैं। उसे यह समझना होगा कि कोई भी समाज जन्म से श्रेष्ठ नहीं होता। श्रेष्ठता केवल ज्ञान, संघर्ष और आत्मसम्मान से आती है। जब व्यक्ति अपने सुख-दुख का नियंत्रण स्वयं संभाल लेता है, तब वह मानसिक रूप से स्वतंत्र हो जाता है। समाज को अपने भीतर की बरकत (समृद्धि) को पहचानना होगा और आधुनिक सक्सेस (सफलता) की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
समापन
आज बहुजन वंचित समाज के सामने सबसे बड़ी आवश्यकता आत्मपहचान और आत्मसम्मान की है। जब तक व्यक्ति अपने सुख-दुख का कारण दूसरों को मानता रहेगा, तब तक वह मानसिक रूप से गुलाम बना रहेगा। कथित स्वर्ण समाज का व्यवहार तभी प्रभावहीन होगा जब बहुजन समाज स्वयं को कमजोर मानना छोड़ देगा। आत्मनिर्भरता, शिक्षा, संघर्ष और आत्मप्रेम ही मुक्ति का मार्ग हैं। इंसान का सबसे सच्चा साथी वह स्वयं होता है। यदि व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को पहचान ले, तो कोई उसे अपमानित नहीं कर सकता। यही आत्मविश्वास सामाजिक परिवर्तन और सम्मानपूर्ण जीवन की वास्तविक कुंजी है।
शेर :
ख़ुद को पहचान लिया तो हर अंधेरा भी उजाला बन गया,
आत्मविश्वास जागा तो तन्हा इंसान भी काफ़िला बन गया।

संकलनकर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी ,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966
स्रोत और संदर्भ :
बहलोल इलाही की थ्रेड्स पोस्ट से प्रेरित एवं सामाजिक अनुभव, बहुजन चिंतन, आत्मसम्मान साहित्य, मनोवैज्ञानिक अध्ययन, जीवन संघर्ष, सामाजिक व्यवहार और मानवीय संबंधों के व्यावहारिक अवलोकन।
