लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
डिस्क्लेमर
प्रस्तुत लेख एक स्वतंत्र सामाजिक और आर्थिक विश्लेषण है। इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, संप्रदाय, जाति या व्यक्तिगत आस्था को अपमानित करना नहीं है।
लेख का मूल लक्ष्य भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना और समाज में व्याप्त उन कुरीतियों की पहचान करना है जो आर्थिक पिछड़ेपन और मानसिक गुलामी का कारण बनती हैं। पाठक इसे केवल एक सुधारात्मक और शैक्षणिक,विमर्श के रूप में ग्रहण करें।
1. प्रस्तावना: मानसिक दासता का अदृश्य कारागार
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल साक्षरता या उपाधि प्राप्त करना नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर विवेक की उस अग्नि को प्रज्वलित करना है जो अंधविश्वास के अंधकार को मिटा सके।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कहा था, “मानसिक गुलामी, शारीरिक गुलामी से कहीं अधिक घातक होती है, क्योंकि गुलाम को अपनी गुलामी का अहसास ही नहीं होता।
आज का बहुजन समाज यदि अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा पाखंड की वेदी पर चढ़ा रहा है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम अभी भी वैचारिक रूप से स्वतंत्र नहीं हुए हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51A (h) स्पष्ट रूप से वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन की भावना विकसित करने का निर्देश देता है।
किंतु, धरातल पर स्थिति यह है कि ‘श्रद्धा’ के नाम पर एक ऐसा सुनियोजित ‘मानसिक उद्योग’ खड़ा कर दिया गया है, जिसका कच्चा माल बहुजन समाज की अशिक्षा और डर है।
2. महिलाएँ और अंधविश्वास का समाजशास्त्र
समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो महिलाएँ अंधविश्वास की सबसे सशक्त ‘सुचालक’ क्यों बनी हुई हैं?
इसके पीछे सदियों का मनोवैज्ञानिक नियंत्रण है।
प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक सिमोन द बोउआर ने कहा था, स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। इसी प्रकार, एक अंधविश्वासी स्त्री भी व्यवस्था द्वारा निर्मित की जाती है I
भय का पोषण
बचपन से ही स्त्रियों को सिखाया जाता है कि परिवार की सुरक्षा, पति की दीर्घायु और बच्चों का भविष्य उनके द्वारा किए गए कर्मकांडों पर टिका है। यह ‘कंडीशनिंग’ उन्हें तार्किक सोच से दूर ले जाती है।
भावनात्मक शोषण
जब कोई माँ अपने बेरोजगार बेटे या बीमार सदस्य के लिए परेशान होती है, तो धर्म के ठेकेदार उसे ‘अवसर’ या ‘इलाज’ देने के बजाय ‘उपाय’ बेचते हैं। यह माँ की ममता का आर्थिक शोषण है।
अदृश्य सत्ता की खोज
जब वास्तविक समाज में स्त्री के पास निर्णय लेने की शक्ति नहीं होती, तो वह उपवासों और मन्नतों के जरिए एक अदृश्य सत्ता’ को नियंत्रित करने का भ्रम पाल लेती है।
3. पाखंड का अर्थशास्त्र: ‘पूंजी का निष्कासन’
महान अर्थशास्त्री दादाभाई नौरोजी ने औपनिवेशिक काल में ‘पूंजी के निष्कासन का सिद्धांत दिया था, जिसमें भारत का पैसा ब्रिटेन जा रहा था।
आज वही स्थिति बहुजन समाज के भीतर है—गरीब का पैसा पाखंडी संस्थानों और बाबाओं की ओर बह रहा है।
साप्ताहिक आर्थिक दोहन का मॉडल
आधुनिक बाज़ारवाद ने धर्म को एक ‘साप्ताहिक सब्सक्रिप्शन’ में बदल दिया है
सोमवार
पत्थर पर दूध का अपव्यय, जबकि करोड़ों बहुजन बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।
मंगलवार
सवा-मणी’ और दान के नाम पर बड़ी पूंजी का संचय।
गुरुवार (गुरु/आश्रम)
पीत-वस्त्रों और निजी आश्रमों की ओर धन का पलायन।
शनिवार
डर की अर्थव्यवस्था’ का सबसे बड़ा उदाहरण।
इन पंक्तियों में 90% आबादी बहुजन समाज की है।
जब घर का पुरुष फैक्ट्री में अपनी देह गलाकर न्यूनतम मजदूरी घर लाता है, तो उस पूंजी का एक बड़ा हिस्सा इन दुकानों के गल्ले में चला जाता है।
यह पूंजी का वह रिसाव है जो समाज को कभी अमीर नहीं होने देता।
4. ढोंगी बाबा: आधुनिक युग के परजीवी
विश्व प्रसिद्ध तर्कशास्त्री अब्राहम कोवूर और महान समाज सुधारक जोतिराव फुले ने बार-बार चेतावनी दी थी कि जो व्यक्ति स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि बताकर आपसे धन
माँगता है, वह सबसे बड़ा धूर्त है।
तर्क की अनुपस्थिति
क्या कभी किसी ने इन बाबाओं से पूछा कि वे स्वयं बीमार पड़ने पर आधुनिक अस्पतालों में क्यों जाते हैं?
यदि उनमें चमत्कारिक शक्ति है, तो वे सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में जाकर जनता की सेवा क्यों नहीं करते?
आर्थिक क्षति
बेटे की नौकरी ‘कौशल’ से लगती है, अनुष्ठान से नहीं। पति की शराब ‘नशामुक्ति’ से छूटती है, शांति पूजा से नहीं। लेकिन अंधविश्वास हमें यथार्थ से दूर कर देता है।
5. ऐतिहासिक त्रासदी और महामानवों का संघर्ष
इतिहास गवाह है कि धर्म के नाम पर औरतों का वस्तुकरण किया गया।
राजा राममोहन राय ने जिस सती प्रथा के खिलाफ संघर्ष किया, वह धर्म की आड़ में की जाने वाली स्त्री-हत्या थी।
महात्मा बुद्ध ने ढाई हजार साल पहले ‘अप्प दीपो भव’ (अपना दीपक स्वयं बनो) का संदेश देकर तर्कवाद की नींव रखी थी। उन्होंने बलि और कर्मकांडों का पुरजोर विरोध किया।
सावित्रीबाई फुले ने औरतों के लिए स्कूल इसलिए खोला ताकि वे स्वतंत्र सोच रख सकें। उन्होंने सिखाया कि ज्ञान ही वह शस्त्र है जो पाखंड की जंजीरों को काट सकता है।
6. आर्थिक मंदी और ‘मन्नत’ का अंतहीन चक्र
बहुजन समाज के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण यह है कि उनकी ‘बचत’ कभी ‘निवेश में नहीं बदल पाती।
अनुत्पादक खर्च
यदि बहुजन समाज केवल एक वर्ष के लिए मंदिर-मस्जिद और बाबाओं को दिया जाने वाला चढ़ावा रोक दे, तो वह भारत के हर जिले में एक आधुनिक विश्वविद्यालय खड़ा
कर सकता है।
कर्ज का बोझ
मन्नत पूरी करने के लिए साहूकारों से ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेना और फिर उसे चुकाने में पूरी उम्र गँवा देना—यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसे धर्म की आड़ में छिपाया जाता है।
7. समाधान: वैचारिक क्रांति और ‘अकल’ का जागरण
अंधविश्वास का इलाज केवल ‘शिक्षा’ नहीं, बल्कि ‘चेतना’ है।
इसके लिए हमें निम्नलिखित कदम उठाने होंगे
बौद्धिक सशक्तिकरण
औरतों को केवल अक्षर ज्ञान नहीं, बल्कि तार्किक समझ देनी होगी। उन्हें समझना होगा कि उनकी मेहनत का पैसा उनके बच्चों की अच्छी डाइट और शिक्षा के लिए है, किसी
पाखंडी की मर्सिडीज के लिए नहीं।
वैज्ञानिक चेतना का प्रसार
घर में बच्चों को सवाल पूछने की आजादी दें। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, “महत्वपूर्ण बात यह है कि कभी सवाल पूछना बंद न करें।
वित्तीय साक्षरता
घर की स्त्रियों को घर का ‘वित्त मंत्री’ बनना चाहिए, बाबाओं का खजांची’ नहीं। हर रुपया जो बाबा की थैली में जाता है, वह आपके बच्चे के भविष्य से की गई चोरी है।
महामानवों का अनुसरण
डॉ. अंबेडकर के ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ के नारे को जीवन में उतारें। शिक्षा का अर्थ विवेकशील होना है।
8. निष्कर्ष: एक जागृत समाज का आह्वान
भगत सिंह ने अपनी अमर कृति ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ में लिखा था कि किसी भी प्रचलित विश्वास का विरोध करने के लिए व्यक्ति को पर्याप्त विवेक की आवश्यकता होती है।
बहुजन समाज तब तक ‘बहुजन’ (शासक या सशक्त) नहीं बन सकता जब तक वह ‘अंधभक्त’ बना रहेगा।
जिस दिन बहुजन नारी शिक्षित और तर्कशील होगी, जिस दिन वह बाबाओं के चरणों के बजाय पुस्तकालयों की ओर रुख करेगी, उसी दिन समाज की दासता की बेड़ियाँ टूट जाएंगी। मेहनत आपकी है, पसीना आपका है, तो उसका लाभ भी आपके परिवार को ही मिलना चाहिए।
जागिए!
अपनी अक्ल का इस्तेमाल कीजिए। अंधविश्वास का अंत ही समृद्धि का आरंभ है।

लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक,ब्यावर, राजस्थान
