हमारे देश में अब बच्चे केवल जन्म नहीं लेते, बल्कि एक परीक्षा का “अटेम्प्ट” बनकर दुनिया में आते हैं। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों के संदर्भ में गंभीर हो जाती है। सदियों की महरूमी (वंचना) के बाद शिक्षा उनके लिए आशा की किरण बनी, पर आज वही शिक्षा अंधी कम्पटीशन (प्रतिस्पर्धा) में बदलती दिख रही है। जन्म लेते ही यह तय होने लगता है कि बच्चा किस स्कूल में जाएगा, किस स्तर की तैयारी करेगा, और भविष्य में किस दौड़ का हिस्सा बनेगा। पर कोई यह नहीं पूछता कि उस नन्हे मन की अपनी इच्छाएँ क्या हैं, उसकी रुचियाँ क्या हैं, और वह भीतर से कितना संतुलित है।

नर्सरी से ही सवाल शुरू हो जाते हैं—स्कूल कौन सा? आगे चलकर—कोचिंग कौन सी? फिर—रैंक क्या आई? अनुसूचित जाति और जनजाति परिवार, जिन्होंने लंबे समय तक तहक़ीर (अपमान) और सामाजिक बहिष्कार सहा है, अब शिक्षा को सम्मान और स्टेटस (सामाजिक हैसियत) पाने का माध्यम मानते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि शिक्षा ने ही कई घरों की तकदीर बदली है। लेकिन जब सम्मान की यह चाहत तुलना में बदल जाती है, तब बच्चा उपलब्धि का साधन बन जाता है। उसकी खुशी, खेल और जिज्ञासा पीछे छूटने लगती है।

सुबह स्कूल, दोपहर कोचिंग, शाम लाइब्रेरी और रात में टेस्ट—यह दिनचर्या उन बच्चों के लिए और भी कठोर है जिनके घरों में संसाधन सीमित हैं। कई बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं जहाँ माता-पिता स्वयं पहली पीढ़ी के शिक्षित हैं। उनकी ख़्वाहिश (इच्छा) होती है कि बच्चा उनसे आगे बढ़े। पर यही ख़्वाहिश अनजाने में प्रेशर (दबाव) बन जाती है। बच्चा समझता है कि उसकी सफलता पूरे परिवार की प्रतिष्ठा से जुड़ी है। वह थकान या असमंजस व्यक्त नहीं कर पाता, क्योंकि उसे लगता है कि असफलता केवल उसकी नहीं, पूरे घर की हार होगी।

बीच में जो थोड़ी राहत या खेल का समय बचता है, उसे “डिस्ट्रैक्शन” कह दिया जाता है। जिन समुदायों ने अवसरों की पाबंदी (प्रतिबंध) झेली है, वे हर क्षण को उपयोगी बनाना चाहते हैं। पर जीवन में बैलेंस (संतुलन) का महत्व अनदेखा कर दिया जाता है। बच्चे को यह समझाया जाता है कि अभी केवल पढ़ाई जरूरी है, बाकी सब बाद में। लेकिन बचपन “बाद में” नहीं आता। जब खेल, मित्रता और रचनात्मकता को रोका जाता है, तो व्यक्तित्व का विकास अधूरा रह जाता है।

अक्सर माता-पिता कहते हैं—“हम तुम्हारे भविष्य के लिए कर रहे हैं।” पर कई बार यह अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाओं की जिद्द (हठ) भी होती है। अनुसूचित जाति और जनजाति समाज में शिक्षा को मुक्ति का टारगेट (लक्ष्य) माना गया है। पर जब यह लक्ष्य लचीला न रहकर कठोर अपेक्षा बन जाता है, तो बच्चा विकल्पों से वंचित हो जाता है। वह अपनी रुचि चुनने के बजाय परिवार और समाज की अपेक्षाओं को ढोने लगता है। उसकी पहचान उसके सपनों से नहीं, दूसरों की आकांक्षाओं से तय होने लगती है।
हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बनना चाहता। कोई कलाकार बनना चाहता है, कोई खेल में आगे बढ़ना चाहता है, कोई सामाजिक सेवा करना चाहता है। पर समाज की रवायत (परंपरा) ने कुछ पेशों को ही सफलता का प्रतीक बना दिया है।

करियर (व्यवसायिक जीवन) को सीमित अर्थों में समझा जाने लगा है। अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों पर यह दबाव इसलिए अधिक होता है क्योंकि उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे “समुदाय का नाम रोशन” करें। यह भावना प्रेरणा भी देती है, पर कभी-कभी असहनीय बोझ बन जाती है।
अब पढ़ाई ज्ञान अर्जन का साधन कम और तुलना का माध्यम अधिक बन गई है। यदि अंक कम आए, तो समझाने के बजाय फीस का हिसाब याद दिलाया जाता है। शिक्षा एक प्रकार का सौदा (लेन-देन) लगने लगती है, जहाँ परिणाम ही सब कुछ है। कोचिंग और संस्थानों के पैकेज (निर्धारित मूल्य योजना) सफलता का वादा करते हैं, पर यह नहीं सिखाते कि असफलता भी सीखने का हिस्सा है। इस व्यवस्था में आर्थिक रूप से कमजोर परिवार अतिरिक्त दबाव में आ जाते हैं।

बच्चों को सिखाया जाता है—गलती मत करो, वरना प्यार कम हो जाएगा। यह संदेश उनके भीतर खौफ़ (डर) पैदा करता है। वे जिज्ञासु विद्यार्थी नहीं, बल्कि परिणाम-केन्द्रित विद्यार्थी बन जाते हैं। उनकी पूरी पहचान परफॉर्मेंस (प्रदर्शन) पर टिक जाती है।

अनुसूचित जाति और जनजाति के कई बच्चे पहले ही सामाजिक भेदभाव का अनुभव कर चुके होते हैं; ऐसे में घर और स्कूल का दबाव मिलकर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकता है।

सच यह है कि हम कई बार करियर नहीं, आज्ञाकारी नागरिक बना रहे होते हैं। जब शिक्षा विकल्प नहीं देती, तो वह मजबूरी (अनिवार्यता) बन जाती है। पूरी सिस्टम (प्रणाली) अंक और रैंक के इर्द-गिर्द घूमने लगती है। इससे रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच कमजोर होती है। जिन समुदायों को शिक्षा के माध्यम से सशक्त होना था, वे फिर एक नई दौड़ में उलझ जाते हैं—जहाँ लक्ष्य समानता नहीं, केवल प्रतिस्पर्धा रह जाता है।
जिस दिन बच्चा यह मान ले कि उसकी कीमत उसकी रैंक है, उसी दिन वह सीखना छोड़ देता है और खुद को साबित करने की सज़ा काटने लगता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि बच्चों की इज़्ज़त (सम्मान) उनके अंकों से कहीं बड़ी है। उनका फ्यूचर (भविष्य) केवल एक परीक्षा या परिणाम से निर्धारित नहीं होता। अनुसूचित जाति और जनजाति के संदर्भ में शिक्षा को प्रतिस्पर्धा का मैदान नहीं, सशक्तिकरण और आत्मविश्वास का माध्यम बनाना ही सच्चा सामाजिक न्याय होगा।

संकलन कर्ता
हगामीलाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक 98292 30966

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