*यह पंक्ति केवल शिकायत नहीं, बल्कि जीवनानुभव की कसक है। जब कोई व्यक्ति सलीक़े, सादगी और अदब को अपना जीवन-मंत्र बना लेता है, तो वह यह मानकर चलता है कि दुनिया भी उसी भाव से उत्तर देगी। परंतु व्यवहार की दुनिया में आदर्श और यथार्थ का टकराव अक्सर मन को चोट पहुँचा देता है। सलीका हमें व्यवस्थित करता है, सादगी हमें सहज बनाती है और अदब हमारे व्यक्तित्व को विनम्रता का आभामंडल देता है। फिर भी कई बार यही गुण व्यक्ति के लिए परीक्षा बन जाते हैं।

*सलीका जीवन का अनुशासन है। बोलने का ढंग, बैठने का तरीका, निर्णय लेने की परिपक्वता—ये सब सलीके के आयाम हैं। सलीकेदार व्यक्ति समाज में सम्मान पाता है, उसकी बातों में वजन होता है और उसके व्यक्तित्व में आकर्षण स्वतः आ जाता है। कार्यस्थल पर ऐसा व्यक्ति सहयोगी वातावरण बनाता है और परिवार में संतुलन बनाए रखता है। सलीका हमें असभ्यता और अराजकता से दूर रखता है।

“सादगी मनुष्य को कृत्रिमता से बचाती है। दिखावे की चमक से दूर, सादगी आत्म-संतोष का द्वार खोलती है। सादा जीवन व्यक्ति को मानसिक शांति देता है, क्योंकि वह तुलना और प्रतिस्पर्धा की दौड़ से बाहर होता है। सादगी में ही गहरी आध्यात्मिकता छिपी है; यह अहंकार को पिघलाकर मन में विनम्रता भर देती है। ऐसे व्यक्ति का आचरण दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है।

*अदब सामाजिक जीवन का सौंदर्य है। अदब से पेश आने वाला व्यक्ति संवाद को मधुर बनाता है, संबंधों को टिकाऊ करता है और विवादों को कम करता है। अदब में सम्मान, धैर्य और सुनने की क्षमता समाहित होती है। यह गुण बच्चों के लिए आदर्श प्रस्तुत करता है और समाज में प्रतिष्ठा बढ़ाता है। अदब से भरा व्यवहार नेतृत्व को भी प्रभावशाली बनाता है।

*लेकिन जब दुनिया प्रतिस्पर्धा, आक्रामकता और स्वार्थ के सिद्धांत पर चलने लगे, तब सलीका और सादगी को लोग कमजोरी समझ लेते हैं। अत्यधिक विनम्रता का दुरुपयोग होने लगता है। जो व्यक्ति हर किसी से शिष्टता से बात करता है, उसकी बात कई बार दबा दी जाती है। अवसरवादी लोग उसके धैर्य और सहनशीलता का लाभ उठाते हैं। यही वह क्षण है जब मन में यह भाव उठता है कि “बहुत नुकसान होता है अदब से पेश आने में।”

*अदब की अति आत्म-अभिव्यक्ति को सीमित कर सकती है। व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और अधिकारों की अनदेखी करने लगता है। हर किसी को प्रसन्न रखने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे आत्म-सम्मान को क्षीण कर देती है। जब कठोर निर्णय लेने का समय आता है, तो सादगी और विनम्रता के कारण व्यक्ति स्वयं को पीछे खींच लेता है। प्रतिस्पर्धी वातावरण में यह झिझक हानि का कारण बन सकती है।

*फिर भी यह समझना आवश्यक है कि दोष गुणों में नहीं, उनके असंतुलित प्रयोग में है। सलीका यदि आत्म-विश्वास से जुड़ा हो तो वह दृढ़ता का रूप ले लेता है। सादगी यदि स्वाभिमान के साथ हो तो वह व्यक्ति को अडिग बनाती है। अदब यदि आत्म-सम्मान से संतुलित हो तो वह कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति बन जाता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति दूसरों की अपेक्षाओं में स्वयं को भुला देता है।

*जीवन का वास्तविक कौशल संतुलन में है। जहाँ आवश्यक हो, वहाँ स्पष्ट और दृढ़ होना भी उतना ही जरूरी है जितना विनम्र होना। सलीका यह नहीं सिखाता कि अन्याय सहते रहें; वह यह सिखाता है कि विरोध भी मर्यादा में हो। सादगी का अर्थ यह नहीं कि आत्म-प्रतिष्ठा का त्याग कर दिया जाए। अदब का अर्थ यह नहीं कि सत्य को दबा दिया जाए। इन गुणों का सही प्रयोग ही इन्हें सार्थक बनाता है।

*समाज को भी आत्ममंथन की आवश्यकता है। यदि हम सलीकेदार और सादगीपूर्ण व्यक्तियों को “बहुत सीधे” कहकर उपेक्षित करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ इन गुणों से दूर हो जाएँगी। सभ्यता का आधार अदब ही है। जब संवाद से शिष्टता समाप्त होती है, तब संघर्ष और कटुता बढ़ती है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम विनम्रता को कमजोरी नहीं, बल्कि संस्कृति की शक्ति समझें।

*अंततः अनुभव यही सिखाता है कि सलीका, सादगी और अदब छोड़ देने में नहीं, बल्कि उन्हें आत्म-सम्मान के साथ जीने में भलाई है। हाँ, कभी-कभी इन गुणों के कारण तात्कालिक नुकसान हो सकता है, पर दीर्घकाल में यही गुण चरित्र की सच्ची पहचान बनते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम विनम्र रहें, पर कमजोर नहीं; सादे रहें, पर असुरक्षित नहीं; और अदब से पेश आएँ, पर अपने अधिकारों के प्रति सजग भी रहें। तभी यह पंक्ति शिकायत नहीं, बल्कि संतुलन की सीख बन जाएगी।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966

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