बीते बारह वर्षों में देश के सार्वजनिक जीवन में जो सबसे बड़ा बदलाव दिखता है, वह हमारी इंसानियत (मनुष्यता) का क्षरण है। लोकतांत्रिक परंपराओं से उपजा संवाद और सह-अस्तित्व कमजोर हुआ, और डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) की आत्मा केवल चुनावी प्रक्रिया तक सिमटती चली गई। मनुष्य के भीतर छिपे भय और आक्रोश को इस तरह उभारा गया कि भाईचारा असहज होने लगा।
समाज के भीतर धीरे-धीरे वहशत (क्रूरता) को सामान्य बना दिया गया। सामूहिक विवेक, जो विविधताओं को जोड़ता था, टूटने लगा और कलेक्टिविटी (सामूहिकता) का अर्थ एक-दूसरे के साथ खड़े होने के बजाय एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होने में बदल गया। यही बदलाव हमें भीतर से कमजोर करता गया।
विचार और असहमति की जगह शोर ने ले ली। हमारी फितरत (स्वभाव) में प्रश्न करना था, पर अब उसे अवांछनीय ठहराया गया। लॉजिक (तर्क) के स्थान पर कुतर्क और गालियों ने जगह बना ली, जिससे सार्वजनिक बहस का स्तर लगातार गिरता चला गया।
भारत ने साम्राज्य झेले, पर निरंकुशता का अनुभव कम था। इतिहास में तानाशाही (निरंकुश शासन) का डर विदेशी ताकतों से जुड़ा रहा, जबकि इम्पीरियलिज़्म (साम्राज्यवाद) ने सत्ता पर कब्जा किया। आज पहली बार सत्ता की शैली में कठोरता और असहिष्णुता भीतर से उभरती दिखाई देती है।
नागरिकों की आवाज़ पर अदृश्य पहरा बैठा दिया गया। असहमति ख़ामोशी (चुप्पी) में बदलती गई और क्वेश्चनिंग (प्रश्न करने की प्रक्रिया) को सत्ता-विरोध समझ लिया गया। सवाल इसलिए नहीं थमे कि लोग डरते हैं, बल्कि इसलिए कि सवाल सत्ता को असहज करते हैं।
आस्था के नाम पर हिंसा का अक़ीदा (आस्था) गढ़ा गया। उदार और करुण प्रतीकों को आक्रामक रूप देकर एक नया नेरेटिव (कथानक/वृत्तांत) रचा गया, जिसने धर्म को नैतिकता से अलग कर दिया और समाज में वैमनस्य बढ़ाया।
अंततः राजनीति का ईंधन नफ़रत (द्वेष) बन गया। 2014 से बना माहौल बहुसंख्यक आशंकाओं पर टिका रहा और पोलराइज़ेशन (विभाजन की राजनीति) ने हर चुनाव को पहचान की लड़ाई बना दिया। देश आगे बढ़ता दिखा, पर सामाजिक चेतना ठहर गई—यही आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

धर्मपाल चंदेल,सम्पादक “जागो हुक्मरान समाचारपत्र”
