भूमिका
“संसार को समझना दर्शन का काम है, उसे बदलना राजनीति का काम है और उसकी पुनर्रचना साहित्य का दायित्व है।” यह कथन केवल चिंतन नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का घोष है। आज जब डिस्कोर्स (विमर्श) को योजनाबद्ध ढंग से मोड़ा जाता है और प्रोपेगैंडा (भ्रामक प्रचार) के माध्यम से जनमत प्रभावित किया जाता है, तब सत्य धुंधला पड़ने लगता है। दर्शन का स्थान डॉग्मा (कट्टर मत) ले लेता है, जिससे विवेक कमजोर होता है। समाज में फ़ितरत (स्वभाव) के स्तर पर प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति घटती है और ज़ेहन (मन-बुद्धि) पर भय का असर बढ़ता है। ऐसे वातावरण में सच बोलना जुर्म (अपराध) जैसा बना दिया जाता है। परिणामस्वरूप सामाजिक चेतना संकट में पड़ती है। इसलिए बौद्धिक वर्ग की सक्रियता केवल विकल्प नहीं, बल्कि नैतिक अनिवार्यता है, ताकि विचार, संवेदना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की जा सके।

  1. दर्शन का स्थान और उसका अपहरण

दर्शन का मूल उद्देश्य तर्क, विवेक और सत्य की खोज है, जो समाज में रैशनलिटी (तर्कशीलता) को सुदृढ़ करता है।

जब अंधविश्वास को योजनाबद्ध तरीके से मैनिपुलेशन (कुचालपूर्ण नियंत्रण) द्वारा फैलाया जाता है, तब स्वतंत्र चिंतन सीमित हो जाता है।

पाखंड को सांस्कृतिक नैरेटिव (प्रचलित कथा-वृत्त) बनाकर जनता की शऊर (जागरूक समझ) को प्रभावित किया जाता है।

प्रश्न उठाने वालों को गुस्ताख़ी (असम्मानजनक साहस) का दोषी ठहराकर तज़लील (अपमान) का वातावरण बनाया जाता है।

परिणामस्वरूप सत्य की खोज के स्थान पर ख़ामोशी (चुप्पी) को आदर्श बना दिया जाता है, जो समाज के बौद्धिक स्वास्थ्य के लिए घातक है।

  1. राजनीति का चरित्र और सत्ता का मोह

राजनीति का मूल उद्देश्य जनकल्याण और गवर्नेंस (सुशासन) है, किंतु जब वह केवल पावर-पॉलिटिक्स (सत्ता-केंद्रित चाल) तक सीमित हो जाए तो लोकतंत्र कमजोर पड़ता है।

चुनावों में कैंपेनिंग (प्रचार-अभियान) के नाम पर झूठ और दुष्प्रचार फैलाकर फ़रेब (छल) को वैध ठहराया जाता है।

भावनात्मक ध्रुवीकरण के माध्यम से समाज में इख़्तिलाफ़ (मतभेद) को संघर्ष में बदला जाता है, जिससे सामाजिक संतुलन बिगड़ता है।

सच बोलने वालों को दबाव की नीति से डराया जाता है और जवाबदेही (उत्तरदायित्व) से बचने का प्रयास होता है।

असंवैधानिक उपायों द्वारा इंसाफ़ (न्याय) की भावना को आहत करना लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है।

  1. शिक्षा बनाम तथाकथित धर्म

शिक्षा का मूल उद्देश्य साइंटिफिक टेम्पर (वैज्ञानिक दृष्टिकोण) और नैतिक संवेदना का विकास है, जिससे समाज में विवेकपूर्ण निर्णय क्षमता बढ़ती है।

जब पाठ्यक्रम पर इंडॉक्ट्रिनेशन (एकांगी विचार-प्रशिक्षण) हावी हो जाए, तब स्वतंत्र चिंतन क्षीण हो जाता है और तअस्सुब (कट्टर पक्षपात) गहराने लगता है।

केवल सर्टिफिकेशन (प्रमाण-पत्र प्राप्ति) तक सीमित शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक बंधनों से मुक्त नहीं कर पाती; वह ज़ंजीर (बंधन) में जकड़ा रह जाता है।

ज्ञान के स्थान पर तब्लिग़ (एकतरफा प्रचार) को महत्व मिलने लगे तो हिकमत (बुद्धिमत्ता) का स्थान संकीर्ण आग्रह ले लेते हैं।

परिणामस्वरूप शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व निर्माण से हटकर विचार-नियंत्रण तक सीमित हो जाता है।

  1. मीडिया और पूंजी का गठबंधन
    मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जिसका दायित्व ट्रांसपेरेंसी (पारदर्शिता) और जनहित की रक्षा करना है।
    जब उस पर पूंजी का कंट्रोल (नियंत्रण) बढ़ जाता है, तो समाचार की जगह स्पिन-डॉक्टरिंग (तथ्यों को घुमा-फिराकर प्रस्तुत करना) हावी हो जाती है।
    भावनात्मक मुद्दों को उछालकर जनता को जज़्बात (भावनाएँ) में उलझाया जाता है, जबकि असली समस्याएँ हक़ीक़त (वास्तविकता) के पर्दे में छिप जाती हैं।
    डिजिटल मंचों पर ट्रोलिंग (उकसावे भरी अपमानजनक टिप्पणी) के जरिए सच बोलने वालों की तौहीन (अपमान) की जाती है।
    परिणामतः जनमत निर्माण की प्रक्रिया प्रभावित होती है और लोकतांत्रिक संतुलन डगमगाने लगता है।
  2. बहुमत और जनचेतना की विडंबना

लोकतंत्र में बहुमत की सत्ता होती है, पर जब मेजॉरिटेरियनिज़्म (बहुसंख्यक वर्चस्ववाद) हावी हो जाए तो संतुलित निर्णय प्रभावित होते हैं।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में जनमत पर पॉपुलिज़्म (लोकलुभावन राजनीति) का असर बढ़ता है और गुमराही (भ्रम की स्थिति) फैलती है।

राजनीतिक चरणवंदना को राष्ट्रभक्ति बताकर ब्लाइंड-फेथ (अंध-आस्था) को बढ़ावा दिया जाता है, जिससे शिनाख़्त (स्वतंत्र पहचान) कमजोर पड़ती है।

आलोचना को डिसेंट (असहमति) के बजाय देशविरोध कहना लोकतांत्रिक गुंजाइश (स्थान/अवसर) को संकुचित करता है।

परिणामतः जनचेतना जागरूक नागरिकता के बजाय भावनात्मक अनुकरण तक सीमित हो जाती है।

  1. बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों की भूमिका

सत्यनिष्ठ कवि और साहित्यकार समाज की अंतरात्मा होते हैं; उनका लेखन एथिक्स (नैतिक सिद्धांत) पर आधारित होता है और अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है।

साहित्य जनचेतना को जगाने का सशक्त माध्यम है, जो क्रिटिकल-थिंकिंग (आलोचनात्मक चिंतन) को प्रोत्साहित करता है और बसीरत (दूरदर्शी समझ) विकसित करता है।

बौद्धिक जनों को भयमुक्त होकर एक्सप्रेशन (अभिव्यक्ति) की स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए तर्क, संवेदना और संविधान की बात करनी चाहिए, ताकि ज़िम्मेदारी (उत्तरदायित्व) का भाव मजबूत हो।

विचारों की स्वतंत्रता और संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना आवश्यक है, जिससे तहज़ीब (संवादी सभ्यता) और लोकतांत्रिक संतुलन सुरक्षित रह सके।

समापन

जब दर्शन भ्रमित हो, राजनीति स्वार्थग्रस्त हो और शिक्षा संकीर्ण हो जाए, तब साहित्य ही समाज का दीपक बनता है। ऐसे समय में रिफॉर्म (सार्थक सुधार) केवल नीतियों से नहीं, बल्कि चेतना से आता है। यदि लोकतंत्र को सस्टेनेबिलिटी (दीर्घकालिक स्थायित्व) देना है, तो अवेयरनेस (जागरूकता) को जन-आंदोलन बनाना होगा। बौद्धिक वर्ग को अज़्म (दृढ़ संकल्प) और ख़ुलूस (निष्कपट भावना) के साथ आगे आना चाहिए। समाज में तफ़क्कुर (गंभीर चिंतन) की परंपरा को पुनर्जीवित कर ही लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा संभव है। पुनर्निर्माण सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि विचार और व्यवहार के परिवर्तन से होता है। यही साहित्य, दर्शन और सक्रिय नागरिकता का साझा और सतत संकल्प होना चाहिए।

शेर:
सच की लौ जलती रहे तो ज़ुल्म का अंधेरा पिघल जाएगा,
कलम उठेगी जब भी साहस से, हर झूठ खुद ढह जाएगा।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 230 966

स्रोत व संदर्भ:
रजनीश गंगवार की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित एवंसामाजिक-राजनीतिक चिंतन, लोकतांत्रिक मूल्यों, समकालीन विमर्श तथा जनचेतना विषयक सार्वजनिक विचारों पर आधारित।

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