आधुनिक बनने की होड़ में मनुष्य का रवैया (व्यवहार) अक्सर संतुलन खो देता है। आज मॉडर्निटी (आधुनिकता) को केवल बाहरी दिखावे से जोड़ दिया गया है, जबकि वास्तविक प्रगति विचारों की ऊँचाई से मापी जानी चाहिए। जब व्यक्ति अपने तर्कों को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए भाषा की मर्यादा तोड़ देता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि वह आधुनिक नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से कमजोर हो रहा है। सच्ची आधुनिकता विनम्रता और संयम से जन्म लेती है, न कि आक्रामक शब्दों और आडंबर से।
वर्तमान समय में बहसों का स्तर चिंताजनक रूप से गिरता जा रहा है। कई लोग कुतर्क को ही लॉजिक (तर्क) समझ बैठते हैं और अपनी बात मनवाने के लिए गलीज़ (घटिया) भाषा का सहारा लेते हैं। ‘पति की प्रेमिका’ या ‘पत्नी का प्रेमी’ जैसे विषयों को जिस सनसनीखेज अंदाज़ में प्रस्तुत किया जाता है, वह सामाजिक विमर्श नहीं, बल्कि मानसिक असंतुलन का संकेत है। शब्दों की गरिमा खोकर कोई भी विचार सार्थक नहीं बन सकता।
अतृप्त ख़्वाहिश (इच्छा) को लोग प्रेम का नाम देने लगते हैं, जबकि वह केवल क्षणिक आकर्षण होता है। किसी भी रिलेशनशिप (संबंध) की नींव विश्वास और पारदर्शिता पर टिकी होती है। जब विश्वास टूटता है और छिपाव बढ़ता है, तो वह संबंध केवल औपचारिकता रह जाता है। प्रेम त्याग और धैर्य चाहता है; वह अवसरवादिता या स्वार्थ का दूसरा नाम नहीं है।

जीवन में कभी-कभी बोरियत (ऊब) स्वाभाविक है, पर उसका समाधान मर्यादा तोड़ना नहीं हो सकता। हर नई दिशा में बढ़ने से पहले एहतियात (सावधानी) आवश्यक है। किसी की दहलीज़ लांघने या किसी खिड़की में झांकने से पहले यह सोचना चाहिए कि उसके परिणाम कितने गहरे हो सकते हैं। क्षणिक आकर्षण से उपजी आह जीवन भर की पीड़ा बन सकती है।

यदि प्रेम है, तो उसमें वफ़ा (निष्ठा) अनिवार्य है। प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि कमिटमेंट (प्रतिबद्धता) भी है। उसमें प्रतीक्षा है, पीड़ा है और आत्मसमर्पण है। जो संबंध छल, छिपाव और अस्थिरता पर आधारित हों, वे प्रेम नहीं हो सकते। सच्चा प्रेम वही है जो मर्यादा की सीमाओं में रहकर भी आत्मा को विस्तार दे और जीवन को गरिमा प्रदान करे।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *