प्रस्तावना
वैचारिक दासता का मूल आधार
​”अनत्तो पाकपा निरिस्सरो”
यह बुद्ध धम्म और मानवतावादी दर्शन का वह सार है जो उदघोष करता है, कि यह संसार किसी अदृश्य ईश्वर या अलौकिक शक्ति द्वारा संचालित नहीं है।

यहाँ कुछ भी ‘अपरिवर्तनशील’ नहीं है। मानव समाज में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह कर्म-कारण के सिद्धांतों और मानवीय व्यवस्थाओं का परिणाम है।

​परंतु, विडंबना यह है कि हज़ारों वर्षों से भारतीय समाज को एक ऐसी वैचारिक अफीम पिलाई गई, जिसने मनुष्य की सोचने-समझने की शक्ति को कुंद कर दिया।

मानव सभ्यता के इतिहास में शोषण के जितने भी औज़ार विकसित किए गए, उनमें ‘पुनर्जन्म’ और ‘भाग्यवाद’ सबसे घातक हैं।

ये केवल आध्यात्मिक कल्पनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक अत्यंत गहरी राजनीतिक और सामाजिक चाल हैं, जिसका एकमात्र उद्देश्य बहुजन समाज को उसके अधिकारों के प्रति अंधा, गूंगा और बहरा बनाए रखना है।

​1 शोषण को ‘दैवीय’ रूप में
देने की रणनीति
​मनुवादी या ब्राह्मणवादी चिंतन की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उसने सामाजिक बुराइयों को ‘पवित्र’ बना दिया। उन्होंने बड़ी चतुराई से गरीबी, लाचारी और जातिगत ऊंच-नीच को ‘पिछले जन्म के कर्मों’ के साथ नत्थी कर दिया।

​जब कोई व्यक्ति अभाव में जीता है, जब उसे दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो उसे व्यवस्था के खिलाफ लड़ने के बजाय यह समझा दिया गया कि,”यह तुम्हारी अपनी गलती है; तुमने पिछले जन्म में पाप किए थे।

यह सिद्धांत सीधे तौर पर शोषक को सुरक्षा कवच प्रदान करता है।

यदि पीड़ित व्यक्ति अपने दुख का कारण स्वयं को मानने लगे, तो वह कभी उस व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाएगा,जिसने उसे गरीब बनाए रखा है। यह विचारधारा
अन्याय को ‘नैतिक वैधता’ (Moral Legitimacy) प्रदान करती है, जिससे अन्याय करने वाला ‘पुण्यशाली’ और सहने वाला ‘पापी’ बन जाता है।

​2 तर्क की कसौटी पर विफलता पहला मनुष्य कौन?
​उत्तर भारत के पेरियार कहे जाने वाले महामना रामस्वरूप वर्मा जी ने इस ढोंगी दर्शन की नींव हिलाने वाला एक सटीक प्रश्न उठाया था,

यदि हर जन्म पिछले जन्म के कर्मों पर निर्भर है, तो सृष्टि का ‘पहला मनुष्य’ किसके कर्मों का फल था?”

​यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर किसी भी धार्मिक ग्रंथ के पास नहीं है। प्रकृति का नियम स्पष्ट है—बिना बीज के वृक्ष नहीं होता। यदि पहला मनुष्य बिना किसी पूर्वजन्म के पैदा हो सकता है, तो फिर यह ‘अनिवार्य नियम’ कैसे हो गया कि हर जन्म के पीछे पूर्वजन्म का होना आवश्यक है?

​आज का आधुनिक विज्ञान
भी इस कल्पना को पूरी तरह खारिज करता है। विज्ञान कहता है, कि मृत्यु के बाद मानव शरीर पंचतत्वों (पदार्थ) में विलीन हो जाता है। पदार्थ अपना रूप बदलता है, लेकिन उसकी व्यक्तिगत पहचान (Identity) समाप्त हो जाती है।

जिस प्रकार नदी समुद्र में मिलने के बाद अपना अस्तित्व खो देती है, उसी प्रकार चेतना का कोई भी अंश किसी ‘अदृश्य हार्ड-ड्राइव’ में स्टोर होकर नए शरीर में नहीं जा सकता।

पुनर्जन्म का कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण आज तक उपलब्ध नहीं है, यह केवल एक मनोवैज्ञानिक भय है।

​3 भाग्यवाद संघर्ष की ऊर्जा का विनाशक
​भाग्यवाद (Fatalism) वह अफीम है, जो मनुष्य की विद्रोह करने की शक्ति को सुला देती है। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा यह मान लेता है कि सब कुछ पहले से तय है,
तो वह अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश ही बंद कर देता है।

​अशिक्षा
यह कोई भाग्य का खेल नहीं, बल्कि संसाधनों की कमी और शिक्षा के निजीकरण का परिणाम है।

​गरीबी
यह प्रारब्ध नहीं, बल्कि गलत आर्थिक नीतियों, भूमि के असमान वितरण और श्रम के शोषण का प्रत्यक्ष फल है।

​जाति
यह कोई ईश्वरीय विधान नहीं है, बल्कि इंसानों द्वारा थोपी गई एक श्रेणीबद्ध असमानता है, जिसे श्रम का विभाजन नहीं बल्कि ‘श्रमिकों का विभाजन’ कहा जाना चाहिए।

​भाग्यवाद
मनुष्य को ‘स्वयं’ की शक्ति से काटकर ‘भाग्य’ के भरोसे छोड़ देता है, जिससे वह सत्ता और व्यवस्था के सामने आत्मसमर्पण कर देता है।

​4 जड़ पर प्रहार,वर्मा जी का क्रांतिकारी दृष्टिकोण
​महामना रामस्वरूप वर्मा जी का मत अत्यंत स्पष्ट था। वे कहते थे कि वर्ण-व्यवस्था, जातिवाद और छुआछूत के जो जहरीले फल आज हमारा समाज चख रहा है, उसकी मुख्य जड़ ‘पुनर्जन्म’ और ‘भाग्यवाद’ की अवधारणा है।

​वे एक सुंदर रूपक के
माध्यम से समझाते थे
​”यदि आप केवल जाति रूपी पत्तों को काटेंगे, तो वे कुछ समय बाद फिर से उग आएंगे। यदि आप केवल शोषण के फूलों को तोड़ेंगे, तो नई कलियाँ पुनः खिल आएंगी।

लेकिन यदि आपने तर्क, विज्ञान और मानवतावाद की कुल्हाड़ी से पुनर्जन्म और भाग्यवाद’ की जड़ पर प्रहार कर दिया, तो शोषण का यह विशालकाय वृक्ष स्वतः ही
धराशायी हो जाएगा।

​जब तक समाज यह मानता रहेगा कि उसकी दुर्दशा का कारण ‘पिछले जन्म के कर्म’ हैं, वह इस जन्म के शोषकों को पहचान नहीं पाएगा।

इसलिए, प्रतीकों की लड़ाई से अधिक आवश्यक वैचारिक
जड़ों की लड़ाई है।

​5 वैज्ञानिक दृष्टिकोण एकमात्र विकल्प
​आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, जहाँ विज्ञान और तकनीक का बोलबाला है। विज्ञान सार्वभौमिक होता है, गुरुत्वाकर्षण या बिजली के नियम हिंदू, मुस्लिम, दलित या सवर्ण सबके लिए एक समान काम करते हैं। इसके विपरीत, पुनर्जन्म और भाग्यवाद के दावे केवल डराने और मानसिक गुलाम बनाए रखने के लिए किए जाते हैं।

​महामना वर्मा जी ने अर्जक संघ के माध्यम से जिस वैज्ञानिक चेतना का आह्वान किया था, वह आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।

हमें यह समझना होगा कि बीमारियां दवाओं से ठीक होती हैं, पूजा पाठ या झाड़ फूंक से नहीं, और गरीबी मेहनत, सही नीतियों और सामाजिक न्याय से दूर होती है, किसी चमत्कार से नहीं।

​6 निष्कर्ष, वर्तमान ही सत्य है
​मनुष्य का उत्थान किसी अदृश्य ‘प्रारब्ध’ पर नहीं, बल्कि बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बताए मार्ग—शिक्षित बनो,संगठित रहो संघर्ष करो पर निर्भर है

​जब तक हम यह मानते रहेंगे कि हमारा दुःख ‘पूर्वजन्म’ का दंड है, हम संगठित नहीं हो पाएंगे।

जिस दिन बहुजन समाज को यह बोध हो जाएगा कि, उसका दुःख इस जन्म की ‘गलत सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था’ का परिणाम है, उसी दिन वास्तविक क्रांति का सूत्रपात होगा।

​अतः, समय की मांग है कि हम काल्पनिक अतीत और अनिश्चित भविष्य के जाल से बाहर निकलें।

वर्तमान की जिम्मेदारी अपने हाथों में लें। तर्क को अपना शस्त्र बनाएँ और एक ऐसे समतामूलक समाज के निर्माण में भागीदार बनें जहाँ मनुष्य की पहचान उसके जन्म या भाग्य से नहीं, बल्कि उसके गुण और मानवता से हो,जय समतामूलक समाज!

​लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य
सामाजिक कार्यकर्ता ब्यावर
94622-60179 sohanlalsingaria@gmail.com

​सन्दर्भ
उत्तर भारत के पेरियार कहे जाने वाले महामना रामस्वरूप वर्मा की पुस्तक पुनर्जन्म और भाग्य

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