हे भारत के नागरिकों!
देश तभी वास्तविक रूप से आज़ाद और सम्मानित होगा, जब उसके नागरिक मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र हों। जब नीचता, घृणा, शोषण, अत्याचार और कुकर्म फैलाने वाली अधर्मी कुव्यवस्था, अंधविश्वास और वर्णभेदी मानसिकता का अंत होगा।
आज हमारी कानून व्यवस्था और प्रशासन केवल कागजी रूप में निष्पक्ष हैं। अफ़सर, नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, राष्ट्रपति,न्यायाधीश आदि पद संविधान के तहत बनते हैं, लेकिन उनका आचरण और निर्णय अक्सर मनुवादी और घृणात्मक सोच से प्रभावित रहता है। यही वजह है कि समाज में असमानता और भेदभाव कायम है।
वे ग्रंथ और परंपराएं—जैसे वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, गीता, भागवत, मनुस्मृति, रामचरितमानस, उपनिषद— जिनमें ऊँच-नीच, जातिवाद और असमानता के संदेश छुपे हैं, आज भी समाज में विभाजन और अन्याय फैलाती हैं। इनका अंधाधुंध पालन न केवल सामाजिक घृणा को बढ़ाता है, बल्कि देश की प्रगति के मार्ग में भी बाधक है।
वह ग्रंथ और परंपराएं, जिनका पाठ और पालन आज भी ऊँच-नीच की मानसिकता को प्रोत्साहित करता है, उनका प्रतीकात्मक रूप से विरोध और त्याग आवश्यक है। केवल गणतंत्र दिवस पर हथियारों की नुमाइश से आज़ादी की भावना पूरी नहीं होती। असली आज़ादी तभी संभव है, जब हम वर्णभेदी, घृणात्मक और असमानतापूर्ण विचारधाराओं का प्रतीकात्मक रूप से जूता मारकर दहन करें और समाज में समानता का संदेश फैलाएँ।
सच्चे राष्ट्रप्रमुख तभी सम्मानित होंगे, जिनका व्यवहार, आचरण और भाषण समानता, न्याय और मानवाधिकार के संदेश को दर्शाता हो। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति, जिला मजिस्ट्रेट और अन्य पदाधिकारी तब ही देश का सम्मान बढ़ा सकते हैं, जब उनके निर्णय और नीतियाँ वर्णभेद, जातिवाद और पाखंड के विरोध में हों।
संविधान का राज तभी साकार होगा, जब मनुस्मृति जैसी घृणात्मक और वर्णभेदी सोच का अंत होगा। भले ही विरोध करने वालों की संख्या अधिक हो, अंबेडकरवादी और समानता की दिशा में काम करना हमारी अनिवार्य जिम्मेदारी है।
आज देश में भ्रष्टाचार, अंधविश्वास और पाखंड चरम पर हैं। विश्व स्तर पर इसका अध्ययन और आलोचना हो रही है। लोग हँस रहे हैं, और कभी-कभी घोर निंदा भी कर रहे हैं। एक निर्जीव पत्थर को भगवान मानकर उसकी पूजा करना और उससे सुख-समृद्धि की कामना करना—यह अंधविश्वास और पाखंड की चरम सीमा है।
ऐसे पाखंडपूर्ण और घृणात्मक विचारों को मिटाना, अंधविश्वास और जातिवाद को समाप्त करना ही आज़ादी और समानता का वास्तविक मार्ग है। देश तभी सच्ची आज़ादी का अनुभव करेगा, जब समाज में फैली वर्णभेदी कागजी गंदगी का प्रतीकात्मक दहन और नकारात्मक प्रभाव का अंत हो।
अंधविश्वास, पाखंड और वर्णभेदपूर्ण सोच को छोड़िए। देश को सही दिशा में ले जाइए। वर्णभेदी कागजी गंद को मिटाकर, अंबेडकरवादी और समानता की दिशा में काम करके ही हम भारत को बचा सकते हैं।
आज की युवा पीढ़ी और जागरूक नागरिक इस आंदोलन में आगे बढ़ें। केवल भाषण, पोस्ट या सोशल मीडिया पर शिकायतें करना पर्याप्त नहीं है। कर्म और चेतना दोनों जरूरी हैं। यही “धर्मयुद्ध” है—वह संघर्ष जो असमानता, जातिवाद और अंधविश्वास से मुक्त भारत की ओर ले जाता है।

लेखक: डगराराम पँवार “नवनीत,”
प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय दलित साहित्य अकादमी, राजस्थान
9414608534
जय भीम।
जय संविधान।
जय भारत।

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