*जमाना बड़ा अजीब है। यहां धोखा देने वाला भी बड़े सलीके से बात करता है, और उसकी आवाज़ में ऐसा अपनापन घुला होता है कि सुनने वाला उसे अपना हमदर्द समझ बैठता है। आज का ठग केवल जेब नहीं काटता, वह भावनाओं की नस पकड़ता है। उसकी भाषा में इतनी मिठास होती है कि सामने वाला सच और छल में फर्क ही नहीं कर पाता। यही उसकी सबसे बड़ी स्ट्रेटजी (रणनीति) होती है। वह सामने वाले की कमजोरी को पहचानकर उसी दिशा में शब्दों के फूल बिछा देता है। उसकी बातों में एक कृत्रिम लताफ़त (कोमलता) होती है, जो दिल को सुकून देती है परंतु अंततः विश्वास की नींव हिला देती है। यही कारण है कि आज मीठे शब्दों से ज्यादा खतरनाक कोई हथियार नहीं।
*समाज में अक्सर कहा जाता है कि जो व्यक्ति अत्यधिक मीठा बोले, उससे सावधान रहना चाहिए। यह कथन अनुभव की आग में तपकर निकला है। हर मधुर आवाज़ के पीछे सच्चाई हो, यह आवश्यक नहीं। कई बार शब्द प्रेजेंटेशन (प्रस्तुति) इतनी सुंदर होती है कि वास्तविकता छिप जाती है। ऐसे लोग अपनी बातों में ऐसा फ़रेब (धोखा) बुनते हैं कि श्रोता को संदेह की गुंजाइश ही नहीं मिलती। वे पहले भरोसा जीतते हैं, फिर उसी भरोसे को भंग कर देते हैं। उनके लिए भावनाएं साधन होती हैं, लक्ष्य नहीं। इसलिए विवेक की आंख खुली रखना समय की मांग है।
*ठग का सबसे बड़ा गुण उसकी अभिनय क्षमता होती है। वह परिस्थिति के अनुसार अपने स्वर, भाव और शब्द बदल लेता है। उसकी पूरी पर्सनालिटी (व्यक्तित्व) एक मुखौटे की तरह होती है। वह सामने वाले के दुख में रोने का अभिनय करता है, उसकी खुशी में शामिल होने का ढोंग करता है। उसकी बातचीत में एक बनावटी हमदर्दी (सहानुभूति) झलकती है, जो धीरे-धीरे विश्वास का पुल बना देती है। परंतु यह पुल स्थायी नहीं होता, क्योंकि उसकी नींव छल पर टिकी होती है। ऐसे लोग संवेदनशील हृदयों को निशाना बनाते हैं।
*मीठे बोलने की कला अपने आप में बुरी नहीं है। मधुर वाणी तो संबंधों की डोर मजबूत करती है। परंतु जब यही मिठास स्वार्थ से प्रेरित हो जाए, तब वह खतरनाक हो जाती है। शब्दों की कम्युनिकेशन (संवाद प्रक्रिया) यदि ईमानदारी पर आधारित हो तो वह जीवन संवार देती है, लेकिन जब उसमें छिपी हो साज़िश (षड्यंत्र), तब वही संवाद विनाश का कारण बन जाता है। अंतर केवल नीयत का होता है। सच्चा व्यक्ति कम बोलता है पर स्पष्ट बोलता है, जबकि ठग अधिक बोलता है पर अस्पष्ट रहता है।
*आज का समय बाहरी चमक-दमक का है। लोग शब्दों के आवरण में छिपे इरादों को पहचानने में असफल हो जाते हैं। ठग अपनी इमेज (छवि) को इतना सुसज्जित बना लेता है कि लोग उसके व्यवहार को आदर्श मानने लगते हैं। उसकी बातों में एक अजीब सी कशिश (आकर्षण) होती है, जो सुनने वाले को बांध लेती है। वह सामने वाले को विशेष महसूस कराता है, उसकी प्रशंसा करता है, और धीरे-धीरे उसकी सोच पर अधिकार कर लेता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति अपनी सहज बुद्धि खो बैठता है।
*अत्यधिक मिठास अक्सर कृत्रिम होती है। प्रकृति में भी संतुलन आवश्यक है। जिस प्रकार अत्यधिक शक्कर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, उसी प्रकार अत्यधिक प्रशंसा भी विवेक को कमजोर कर देती है। ठग अपनी प्लानिंग (योजना) पहले से तय कर लेता है। वह अवसर की प्रतीक्षा करता है और सही समय पर वार करता है। उसकी भाषा में एक छिपी हुई मक्कारी (कपटपूर्ण चतुराई) होती है, जो धीरे-धीरे सामने आती है। जब तक सच्चाई उजागर होती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
*लोग अक्सर बाहरी व्यवहार से प्रभावित हो जाते हैं। वे शब्दों को चरित्र का प्रमाण मान लेते हैं। परंतु सच्चाई यह है कि व्यवहार और चरित्र में अंतर हो सकता है। किसी व्यक्ति की रियलिटी (वास्तविकता) उसके कर्मों से प्रकट होती है, न कि उसके वचनों से। ठग की वाणी में एक झूठी नफ़ासत (सूक्ष्म शालीनता) होती है, जो पहली दृष्टि में आकर्षक लगती है। लेकिन समय के साथ उसकी असलियत सामने आ जाती है। इसलिए किसी पर भरोसा करने से पहले उसके कार्यों को परखना आवश्यक है।
*विश्वास मानव संबंधों की आधारशिला है। यदि यह एक बार टूट जाए तो पुनः स्थापित करना कठिन होता है। ठग इस विश्वास का दुरुपयोग करता है। वह भावनाओं के साथ खेलता है और फिर अचानक गायब हो जाता है। उसकी पूरी साइकोलॉजी (मनोविज्ञान) इस बात पर आधारित होती है कि सामने वाला व्यक्ति कैसे सोचता है। वह उसी सोच का लाभ उठाकर अपनी चालाकी (धूर्त बुद्धिमत्ता) को अंजाम देता है। इसीलिए कहा जाता है कि केवल मीठे शब्दों से प्रभावित न हों।
*समाज में सज्जन और कपटी दोनों प्रकार के लोग रहते हैं। हमें अपने अनुभव और विवेक का सहारा लेना चाहिए। किसी की अप्रोच (दृष्टिकोण) यदि अत्यधिक लुभावनी लगे, तो उसमें छिपे उद्देश्य को समझने का प्रयास करें। हर चमक सोना नहीं होती। कई बार वह केवल धोखेबाज़ी (विश्वासघात) का आवरण होती है। सजग रहना और प्रश्न पूछना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है। जो व्यक्ति स्पष्ट उत्तर देने से बचता है, उसकी नीयत पर संदेह स्वाभाविक है।
*अंततः यही कहा जा सकता है कि मीठे शब्द स्वयं में दोषी नहीं होते, दोषी होती है उनके पीछे की नीयत। हमें अपने भीतर अवेयरनेस (जागरूकता) विकसित करनी होगी। जब तक हम विवेकशील नहीं बनेंगे, तब तक छल करने वाले अवसर खोजते रहेंगे। जीवन में सच्चाई की पहचान ही सबसे बड़ी हिफ़ाज़त (सुरक्षा) है। जमाना चाहे जितना अजीब क्यों न हो, यदि हम सतर्क और सजग रहेंगे तो किसी के मीठे शब्द हमें भ्रमित नहीं कर पाएंगे। मीठी वाणी का सम्मान करें, परंतु आंखें खुली रखें—यही समय की सीख है।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966
