कांटे तो बस यूँ ही बदनाम हैं, लोगों को चुभती तो ‘बातें’ ज़्यादा हैं ! प्रकृति के कांटे दिखाई देते हैं, इसलिए उनसे बचाव संभव है; पर मनुष्य की वाणी के कांटे अदृश्य होते हैं, इसलिए उनका आघात अधिक गहरा होता है। एक कठोर शब्द, एक तिरस्कारपूर्ण संबोधन या व्यंग्य से भरी टिप्पणी किसी के आत्मसम्मान को भीतर तक घायल कर सकती है। भारतीय समाज में वाणी को सृजन की शक्ति माना गया है, फिर भी हम उसे विनाश का औज़ार बना लेते हैं। “निकम्मा”, “नालायक”, “मूर्ख”, “गंवार” जैसे शब्द केवल ध्वनि नहीं, बल्कि मानसिक आक्रमण हैं। सच यही है कि लोगों को सबसे अधिक चुभती बातें हैं, और वे अक्सर वर्षों तक स्मृति में जीवित रहती हैं।

किसी को जानबूझकर इरिटेट करना आज एक प्रवृत्ति बनती जा रही है। कई लोग दूसरे की कमजोरी पहचानकर उसी पर बार-बार चोट करते हैं। “तुमसे कुछ नहीं होगा”, “तुम अक्लहीन हो”, “तुम्हारी औकात क्या है”—ऐसे वाक्य केवल क्षणिक क्रोध नहीं, बल्कि भीतर छिपी असंवेदनशीलता का प्रमाण हैं। जो स्वयं असुरक्षित होता है, वही दूसरे को अस्थिर कर आनंद महसूस करता है। यह व्यवहार धीरे-धीरे सामाजिक संबंधों में कटुता और दूरी पैदा करता है।

जलील करना और नीचा दिखाना भी भाषाई हिंसा का हिस्सा है। “घटिया”, “निकृष्ट”, “अधम”, “कमीना”, “कायर” जैसे शब्द किसी की संपूर्ण पहचान को नकार देने का प्रयास करते हैं। जब किसी को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता है, तो उसकी आत्मछवि पर गहरा प्रभाव पड़ता है। बार-बार तिरस्कार सुनने वाला व्यक्ति स्वयं को कमतर समझने लगता है। यह मानसिक क्षरण किसी भी शारीरिक चोट से अधिक गंभीर हो सकता है, क्योंकि यह आत्मविश्वास की जड़ पर प्रहार करता है।

रहन-सहन और कपड़ों को लेकर टिप्पणी करना भी सामाजिक अहंकार का उदाहरण है। “गंवार लग रहे हो”, “जाहिलों जैसा पहनावा है”—ये वाक्य केवल फैशन पर टिप्पणी नहीं, बल्कि वर्ग और संस्कार पर निर्णय हैं। आधुनिक समाज में बाहरी चमक को प्रतिष्ठा का मापदंड बना दिया गया है। सादगी का मज़ाक उड़ाना और दिखावे को श्रेष्ठता का प्रतीक मानना हमारी संवेदनहीनता को दर्शाता है। वस्त्र व्यक्ति की गरिमा तय नहीं करते; पर शब्द उसे गिरा अवश्य सकते हैं।

अपने आपको श्रेष्ठ और दूसरे को हीन मानने की मानसिकता अक्सर जाति, धर्म और संप्रदाय के आधार पर प्रकट होती है। किसी समुदाय को “पिछड़ा”, “ढोंगी” या “असभ्य” कहना सामूहिक अपमान है। यह दृष्टिकोण केवल व्यक्ति को नहीं, समाज की एकता को भी आहत करता है। श्रेष्ठता का यह भ्रम प्रायः अज्ञान और पूर्वाग्रह से जन्म लेता है। जो वास्तव में श्रेष्ठ होता है, उसे दूसरों को नीचा दिखाकर अपनी ऊँचाई सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती।

न्याय और अन्याय के संदर्भ में भी भाषा की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्रभावशाली व्यक्ति की गलती को “छोटी भूल” कह देना और कमजोर की त्रुटि को “अपराध” घोषित कर देना—यह दोहरा मापदंड शब्दों में ही छिपा होता है। एक पक्ष के लिए “मजबूरी” और दूसरे के लिए “बदनियत” जैसे शब्द चुन लेना निष्पक्षता को समाप्त कर देता है। जब भाषा पक्षपाती हो जाए, तो न्याय का स्वरूप भी विकृत हो जाता है। न्याय का ढोंग करते हुए अन्याय करना समाज को भीतर से खोखला करता है।

पूर्वजों की गलतियों के लिए वर्तमान पीढ़ी को दोषी ठहराना भी एक प्रकार की भाषाई क्रूरता है। “तुम्हारे लोग ऐसे ही होते हैं” जैसे वाक्य किसी की व्यक्तिगत पहचान को नकार देते हैं। इतिहास से सीख लेना आवश्यक है, पर उसे ताने का माध्यम बनाना अनुचित है। व्यक्ति अपने कर्मों से पहचाना जाना चाहता है, न कि अपने वंश की गलतियों से। जब हम अतीत को आरोप का आधार बनाते हैं, तो भविष्य की संभावनाओं को सीमित कर देते हैं।

दोगलापन और कथनी-करनी का अंतर भी समाज में अविश्वास को बढ़ाता है। सामने से सम्मानजनक संबोधन और पीछे से “झूठा”, “कपटी”, “स्वार्थी” जैसे शब्द—यह दोहरा व्यवहार विश्वास की नींव हिला देता है। शब्द और कर्म में सामंजस्य न हो तो संबंधों की स्थिरता समाप्त हो जाती है। पाखंड केवल धार्मिक या सामाजिक आचरण तक सीमित नहीं, बल्कि भाषा में भी प्रकट होता है। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे सामाजिक विश्वसनीयता को नष्ट करती है।

बातों की चुभन का प्रभाव विशेषकर बच्चों और युवाओं पर गहरा पड़ता है। यदि किसी बच्चे को बार-बार “बेवकूफ” या “निकम्मा” कहा जाए, तो वह स्वयं को उसी दृष्टि से देखने लगता है। कार्यस्थल पर अपमानजनक भाषा कर्मचारी की ऊर्जा और रचनात्मकता को समाप्त कर देती है। शब्द प्रेरणा का स्रोत भी बन सकते हैं और अवसाद का कारण भी। यह हमारे चयन पर निर्भर करता है कि हम वाणी को प्रोत्साहन का माध्यम बनाएं या निराशा का।

अंततः, कांटे प्रकृति का नियम हैं, पर कटु वाणी हमारा चयन है। यदि हम अपने शब्दों में संयम, करुणा और न्याय का भाव जोड़ दें, तो समाज की अनेक समस्याएँ स्वतः कम हो सकती हैं। “निकम्मा” की जगह “प्रयास करो”, “मूर्ख” की जगह “सीख सकते हो”—इतना परिवर्तन ही पर्याप्त है। लोगों को सबसे अधिक चुभती बातें हैं; इसलिए हमारी बातें मरहम बनें, यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। जब भाषा सम्मानजनक होगी, तब संबंध भी सम्मानपूर्ण होंगे, और समाज अधिक संवेदनशील, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक मानवीय बन सकेगा।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829230966

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