गरीब को इश्क़ (प्यार) हुआ है, और यह इश्क़ केवल दिल का नहीं, बल्कि आत्मा का है। इस इश्क़ में वह माशूक़ (प्रिय) नहीं, बल्कि परवरदिगार है। उसकी आँखों में अश्क़ (आँसू) बहते हैं, पर ये अश्क़ केवल दर्द के नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शौक़ (प्रगाढ़ इच्छा) और तपिश (उष्मा, जुनून) के हैं। महंगाई के इस दौर में, जब रुपया-पैसा सीमित है, गरीब की तन्हा (अकेलापन) रूह भी इश्क़ की राह में मस्ताना (बेहोश, आनंदित) हो जाती है। गरीब का दिल इश्क़बाज़ (प्रेम में खो जाने वाला) है, जो परवरदिगार की रहमत (कृपा) में डूबा रहता है।
इश्क़बाज़ गरीब अपने हिज्र (वियोग) को सहता है और सहनशीलता की मिसाल पेश करता है। उसका मस्ताना (बेहोश, आनंदित) दिल दिवाना (पागलपन) होता है, और तस्सवुर (कल्पना) में वह परवरदिगार के दर्शन करता है। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उसकी वफ़ा (निष्ठा) और रहमत (कृपा) में कमी नहीं आती। गरीब, जो अरबी में ज्ञानी कहलाता है, अपने ज्ञान से यह समझता है कि असली ख़ज़ाना रुपया-पैसा नहीं, बल्कि रौशनी (आध्यात्मिक प्रकाश) और आत्मा का शौक़ (प्रगाढ़ इच्छा) है।
महंगाई ने जिस तरह लोगों को परेशान किया है, वह इश्क़ के लिए भी चुनौती बन गई है। लेकिन गरीब का इश्क़ सिर्फ़ भौतिकता में नहीं फँसता। वह माशूक़ (प्रिय) की तलाश में सफ़र (यात्रा) करता है, पर सफ़र केवल बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि अपने अंदर की तपिश (उष्मा, जुनून) और खाक (अहंकार का नाश) में भी होता है। यही तन्हा (अकेलापन) यात्रा उसे इश्क़ की गहराई तक ले जाती है।
इश्क़ में मयार (मानदंड) और हुस्न (सौंदर्य) का अनुभव तब और भी गहरा होता है जब व्यक्ति के पास दुनिया के साधन नहीं होते। गरीब के लिए, जो सोच-समझ से भी चीज़ों को आंकता है, यह समझना आसान होता है कि बाहरी सुख-सुविधाएँ केवल भ्रम हैं। असली प्रेम और इश्क़ तो उस रौशनी (आध्यात्मिक प्रकाश) में है, जो आत्मा को प्रकाशित करती है। इश्क़बाज़ दिल मस्ताना (बेहोश, आनंदित) और दिवाना (पागलपन) होकर इस प्रकाश की ओर अग्रसर होता है।
तस्सवुर (कल्पना), तपिश और अश्क़ इस इश्क़ की अभिव्यक्ति हैं। गरीब की निष्ठा और वफ़ा (निष्ठा), जबकि साधन कम हैं, यह दिखाते हैं कि इश्क़ केवल जूनून और पागलपन का नाम नहीं, बल्कि आत्मा का रहमत (कृपा) और समझ है। हर दिन महंगाई की चुनौतियों में भी उसका इश्क़बाज़ ( दिल धैर्य रखता है और रहमत की खोज में तन्हा सफ़र करता है।
गरीब के इश्क़ में दिवानापन और जुनून (प्रगाढ़ चाहत) इस हद तक बढ़ जाता है कि वह दुनिया की चिंताओं को भूल जाता है। उसकी ज़िंदगी में शौक़ और तपिश (उष्मा, जुनून) की मौजूदगी उसे मस्ताना (बेहोश, आनंदित) बनाती है। अश्क़ बहते हैं, पर ये अश्क़ दुःख के नहीं, बल्कि प्रेम की गहराई और आत्मिक रौशनी (आध्यात्मिक प्रकाश) के लिए हैं। इश्क़बाज़ व्यक्ति जानता है कि अल्लाह की रहमत में ही असली सुख और ख़ज़ाना है।
महंगाई के दौर में गरीब की आर्थिक सीमाएँ इश्क़ में बाधा नहीं बनतीं। उसकी तन्हा (अकेलापन) आत्मा, खाक (अहंकार का नाश) और मस्ताना दिल, इश्क़ की राह में रौशनी की ओर अग्रसर रहती है। वह माशूक़ की तलाश में नहीं, बल्कि परवरदिगार की रहमत और रहनुमाई में खो जाता है। उसका हिज्र (वियोग) और तपिश उसे और भी निखारता है।
इश्क़बाज़ गरीब जानता है कि इस सफ़र (यात्रा) में वफ़ा , रहमत और शौक़ (प्रगाढ़ इच्छा) का महत्व है। उसका दिवाना दिल बाहरी सुखों में नहीं, बल्कि अंदर की रौशनी (आध्यात्मिक प्रकाश) और तस्सवुर (कल्पना) में आनंद पाता है। मयार (मानदंड) और हुस्न (सौंदर्य) की कसौटी पर खरा उतरने वाला यह इश्क़ , दुनिया की महंगाई और कठिनाइयों के बावजूद, स्थिर और अडिग रहता है।
सस्ता सा इलाज इस दौर की महंगाई और दिल की बेचैनी के लिए वही है जो इश्क़बाज़ (गरीब अपनाता है: धैर्य, तस्सवुर , रहमत और अपने दिल की रौशनी में विश्वास। इस इश्क़ में अश्क़ (आँसू) और तपिश ( दोनों ही साथी हैं, पर यह साथी उसे मस्ताना (बेहोश, आनंदित) और दिवाना बनाते हैं। उसकी तन्हा यात्रा उसे अंदर की गहराई तक ले जाती है।
अंततः गरीब का इश्क़ महंगाई के दौर में यह संदेश देता है कि प्यार और समर्पण केवल रुपया-पैसा से नहीं मापा जाता। माशूक़ ( केवल अल्लाह है, और इश्क़बाज़ दिल में वफ़ा , रहमत , तपिश (उष्मा, जुनून) और दिवानापन का मिश्रण असली धन है। यही इश्क़ मानव और आत्मा दोनों को समृद्ध करता है, और यही गरीब को सच्ची रौशनी (आध्यात्मिक प्रकाश) और शांति देता है।
शेर
“गरीब की तन्हा रूह में इश्क़ की तपिश,
हर अश्क़ में छुपी है रहमत की रौशनी।”
यह शेर सीधे तौर पर इश्क़ (प्यार), तपिश (जूनून), अश्क़ (आँसू) और रहमत (कृपा) को दर्शाता है और महंगाई और कठिनाइयों के बीच भी आध्यात्मिक प्रेम की शक्ति को उजागर करता है।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966
