मात पिता और कुटूम्ब कबीलों अपना फर्ज निभाना है।
मां ना धोकर अच्छा रखतीं दुधं का कर्ज उतारना है।।
मेरे बच्चे पढ़ लिख कर अच्छे बने मात पिता यै सोचते हैं।
दया अहिंसा और प्रेम के पथं पर चले ऐसे हमें सिखातें है।।
मात पिता और कुटूम्ब कबीलों अपना फर्ज निभाना है।
मां ना धोकर अच्छा रखतीं दुधं का कर्ज उतारना है।।
घर आये अतिथि ओर बड़ों का आदर सत्कार देना है।
आदर सत्कार कर अतिथि की मन भावना अपना कर देना हैं।।
मात पिता और कुटूम्ब कबीलों अपना फर्ज निभाना है।
मां ना धोकर अच्छा रखतीं दुधं का कर्ज उतारना है।।
जीव जन्तु ओर वनस्पति में बेमतलब घावं नीं देना है।
पशु पक्षी और पेड़ पौधों अपने जीव के संगी है।।
ज्ञान और ध्यान प्रकृति में सत कर्म कर चलनों है।
स्कूल जावो पढ़ो विद्या गुरूजी को सम्मान देना है।।
इन्द्र गांजे जल बरसावें धरती हरी-भरी राखे है।
उसी तरह मात पिता अपने बच्चों ने आसल में राखे है।।
मात पिता और कुटूम्ब कबीलों अपना फर्ज निभाना है।
मां ना धोकर अच्छा रखतीं दुधं का कर्ज उतारना है।।
हित और अहित कर्म कुकर्म संभल कर कार्य करनो हैं।
कहें कवि टीकम अपनी आदत को सही मार्ग पर लानों है।।

लेखक।
टीकमचंद मंशा राम जी।।
आदर्श ढूंढा कवास बाड़मेर राजस्थान।।
पिन 344035
9414972123
