कहते हैं कि पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होते हैं। पर हमारे कुछ महाशय ऐसे हैं जिनके लिए यह स्तंभ नहीं, “स्टूडियो का स्टंट” है। कल्पना कीजिए, अगर देश में मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुसलमान की बहसें न होतीं, और पड़ोस में बांग्लादेश तथा पाकिस्तान नाम की स्थायी ब्रेकिंग न्यूज़ फैक्ट्रियाँ न होतीं, तो हमारे कुछ एंकरों की हालत क्या होती? शायद वे सचमुच सड़क किनारे कबाड़ बीनते मिलते—क्योंकि उन्हें असली मुद्दों की धातु पहचानने की कला तो आती नहीं, पर कबाड़ की खनक पर दौड़ पड़ने की आदत खूब है।

आजकल पत्रकारिता का एक नया विज्ञान विकसित हुआ है—“उत्तेजना शास्त्र।” इसमें तथ्यों का महत्व उतना ही है जितना चाय में इलायची का—न हो तो भी चलेगा, पर शोर होना चाहिए। स्टूडियो की लाइटें ऐसे चमकती हैं जैसे कोई महायुद्ध छिड़ गया हो। एंकर की आवाज़ में ऐसा कंपन होता है मानो सीमा पर वही अकेला प्रहरी खड़ा हो। विषय? वही पुराना—मंदिर उधर, मस्जिद इधर, पड़ोस उधर, दुश्मन इधर।

अगर यह सब न हो तो बहस किस पर होगी? बेरोज़गारी? महँगाई? शिक्षा? स्वास्थ्य? अरे भई, ये सब तो उबाऊ विषय हैं। इन पर बहस करने से टीआरपी नहीं, सिरदर्द बढ़ता है। दर्शक भी अब इस मसाले के आदी हो चुके हैं। जैसे बिना मिर्च का खाना फीका लगता है, वैसे ही बिना धार्मिक तड़के की खबर उन्हें अधूरी लगती है। तो हमारे कुछ पत्रकारों ने यह फ़ॉर्मूला साध लिया है—“डर बेचो, क्रोध सजाओ, और राष्ट्रभक्ति का रिबन बाँध दो।”

सोचिए, अगर पड़ोसी देश शांत, सहयोगी और मित्रवत हो जाएँ, सीमाएँ स्थिर हो जाएँ, और समाज में आपसी सद्भाव बढ़ जाए, तो न्यूज़रूम में कैसी खामोशी छा जाएगी! एंकर महोदय को पहली बार शोध करना पड़ेगा—डेटा खोजना पड़ेगा, रिपोर्ट पढ़नी पड़ेगी, ज़मीन पर जाना पड़ेगा। यह सब उनके लिए वैसा ही कठिन है जैसे किसी तोते से कहा जाए कि अब रटी हुई लाइनें छोड़ो और खुद कविता रचो।

कबाड़ बीनने वाली उपमा यूँ ही नहीं आई। कबाड़ बीनने वाला व्यक्ति भी मेहनती होता है; वह बिखरे हुए टुकड़ों में मूल्य खोजता है। पर हमारे कुछ पत्रकार बिखरे हुए तथ्यों को जोड़कर मूल्य नहीं, विवाद खोजते हैं। उन्हें हर घटना में “साजिश” दिखती है, हर बयान में “धमाका,” हर चुप्पी में “षड्यंत्र।” अगर यह स्थायी शत्रु-कथा खत्म हो जाए तो उनकी कल्पनाशक्ति सूख जाएगी।

न्यूज़रूम का दृश्य बदल जाएगा। पहले जहाँ “ब्रेकिंग” की लाल पट्टी बिजली की तरह चमकती थी, वहाँ अब “विश्लेषण” लिखना पड़ेगा। और विश्लेषण के लिए पढ़ाई चाहिए, धैर्य चाहिए, संतुलन चाहिए। पर जिनकी आदत हर शाम युद्ध की घोषणा करने की हो, वे शांति की रिपोर्टिंग कैसे करेंगे? शांति में न तो ऊँची आवाज़ की ज़रूरत है, न उँगली उठाकर चिल्लाने की। वहाँ तो संवाद चाहिए—और संवाद में तर्क भी सुनना पड़ता है।

कुछ पत्रकारों की रोज़ी-रोटी “हम बनाम वे” के सिद्धांत पर टिकी है। वे दर्शकों को दो खेमों में बाँटते हैं और खुद बीच में खड़े होकर रेफरी बन जाते हैं। कभी-कभी तो लगता है कि बहस में बुलाए गए मेहमान नहीं, खुद एंकर ही असली प्रतियोगी हैं। वे सवाल कम, फैसले ज़्यादा सुनाते हैं। अगर पड़ोस में स्थायी दुश्मन का साया न रहे, तो उनका यह अखाड़ा सूना पड़ जाएगा।

फिर वे क्या करेंगे? शायद सचमुच सड़कों पर निकलेंगे—पर इस बार रिपोर्टिंग के लिए। तब उन्हें पता चलेगा कि देश की असली कहानियाँ स्टूडियो की कृत्रिम रोशनी में नहीं, धूप-धूल में मिलती हैं। वहाँ किसान की चिंता है, छात्र की आकांक्षा है, मजदूर की थकान है, महिला की सुरक्षा है। पर इन विषयों में “धमाका” कम और “धैर्य” ज़्यादा चाहिए। और धैर्य तो टीआरपी मीटर में नहीं मापा जाता।

व्यंग्य की बात यह है कि कबाड़ बीनना भी एक ईमानदार काम है; वह शहर को साफ करता है। पर कुछ पत्रकारों की सनसनी शहर के मन को गंदा कर देती है। वे शब्दों का ऐसा कचरा फैलाते हैं जिसे समेटने में समाज को सालों लग जाते हैं। अगर मंदिर-मस्जिद की आग न भड़काई जाए, अगर पड़ोसी देशों का नाम हर घंटे न उछाला जाए, तो शायद समाज की हवा भी कुछ साफ हो।

कल्पना कीजिए एक ऐसे दिन की, जब किसी चैनल पर बहस हो—“कैसे बढ़े पुस्तकालयों की संख्या?” या “कैसे सुधरे सरकारी अस्पताल?” एंकर की आवाज़ सामान्य हो, मेहमान एक-दूसरे को सुनें, और निष्कर्ष में समाधान निकले। उस दिन शायद कुछ दर्शक चैनल बदल दें—उन्हें शोर की लत जो लगी है। पर जो रुकेंगे, वे समझेंगे कि पत्रकारिता शोर नहीं, प्रकाश है।

इस व्यंग्य का आशय किसी देश, धर्म या समुदाय का उपहास नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति पर चोट है जो विभाजन को व्यवसाय बना देती है। पड़ोसी देश रहेंगे, मतभेद भी रहेंगे, पर अगर हर मुद्दे को युद्ध बना दिया जाए तो शांति की कोई संभावना ही नहीं बचेगी।

इसलिए अगर कभी ऐसा चमत्कार हो जाए कि समाज में सौहार्द बढ़े, पड़ोसी मित्र बनें, और धर्म राजनीति का औज़ार न रहे—तो कुछ पत्रकारों को सचमुच नया कौशल सीखना पड़ेगा। शायद वे तब खोजी पत्रकार बनें, शायद जनसेवा की राह पकड़ें, या फिर—व्यंग्य की अतिशयोक्ति में कहें—कबाड़ ही बीनें, पर कम से कम समाज का कचरा तो साफ करेंगे।

अंततः प्रश्न यह नहीं कि कौन कबाड़ बीन रहा है, बल्कि यह है कि कौन समाज के मन में कबाड़ भर रहा है। जब पत्रकारिता सच के प्रति ईमानदार होगी, तब उसे न स्थायी दुश्मन की ज़रूरत होगी, न स्थायी विवाद की। तब न्यूज़रूम में शोर कम, प्रकाश अधिक होगा—और शायद वही दिन लोकतंत्र के लिए सच्चा उत्सव होगा।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966

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