यह साफ़–साफ़ समझ लेना चाहिए कि राजस्थान की दक्षिणपंथी सरकार द्वारा अंबेडकरवादी पीठ को समाप्त करना कोई सामान्य शैक्षणिक पुनर्गठन नहीं है, बल्कि यह एक आइडियोलॉजिकल (विचारधारात्मक) हमला है। यह फ़ैसला सत्ता की उस मेंटैलिटी (मानसिकता) को उजागर करता है, जो मनुस्मृति की गोद में बैठकर समाज पर हुकूमत करना चाहती है। अंबेडकरवादी पीठ सामाजिक बराबरी, इंसाफ़ और संविधान की बात करती थी, जो मनुवादी ढांचे के लिए हमेशा ख़तरा रही है। इसलिए इसे एक साज़िश के तहत समाप्त किया गया। यह कदम न सिर्फ़ अकादमिक स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि एक रिएक्शनरी (प्रतिक्रियावादी) और ऑर्गनाइज़्ड (संगठित) कोशिश है, ताकि दलित–बहुजन चेतना को कमजोर किया जा सके। जो सत्ता अंबेडकर के विचारों से डरती है, वह लोकतंत्र की नहीं, बल्कि वर्चस्व की राजनीति करती है।
यह पीठ सत्ता के लिए खतरनाक इसलिए थी,
क्योंकि यह स्थापित नैरेटिव (कथा) को चुनौती देती थी। यह पीठ जाति को “संस्कृति” नहीं, बल्कि जुर्म कहती थी और समाज में फैली नाइंसाफ़ी की जड़ों पर सीधा वार करती थी। यह आरक्षण को किसी रियायत (छूट) की तरह नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त राइट (अधिकार) मानती थी, जिसे कमज़ोर करना लोकतंत्र पर हमला है। यह तथाकथित हिंदू राष्ट्र की कल्पना को अनकांस्टीट्यूशनल (संविधान विरोधी) बताकर सत्ता के लिए थ्रेट (खतरा) बन जाती थी। यह ब्राह्मणवाद को किसी परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक सिस्टम की बीमारी मानती थी। लेकिन सत्ता के लिए सबसे बड़ा अपराध यह था कि यह पीठ दलित–बहुजन युवाओं को सोचने, सवाल करने और ऑर्गनाइज़ (संगठित) होने की ताक़त दे रही थी, जो हर वर्चस्ववादी सत्ता को बेचैन (अशांत) कर देती है।
दक्षिणपंथी सत्ता और अंबेडकर : जन्मजात दुश्मनी
यह भ्रम में रहने का समय नहीं है। दक्षिणपंथी (राइट विंग – दक्षिणपंथी) राजनीति और अंबेडकरवाद साथ नहीं चल सकते। एक तरफ़ मनु, दूसरी तरफ़ संविधान; एक तरफ़ वर्ण व्यवस्था, दूसरी तरफ़ इंसानी गरिमा (मानवीय सम्मान); एक तरफ़ आस्था की ग़ुलामी , दूसरी तरफ़ साइंटिफिक (वैज्ञानिक) चेतना। यही बुनियादी टकराव है।
डॉ. अंबेडकर ने समाज को इल्म (ज्ञान) और तर्क की रोशनी में देखने का आग्रह किया, जबकि दक्षिणपंथी सत्ता डॉग्मा (कट्टर मान्यता) पर आधारित व्यवस्था को बनाए रखना चाहती है। अंबेडकरवाद बराबरी और जस्टिस (न्याय) की बात करता है, जो वर्चस्ववादी सत्ता के लिए हमेशा थ्रेट रहा है।
डॉ. अंबेडकर का यह कथन— “जाति का विनाश किए बिना भारत का उद्धार संभव नहीं”— आज भी सत्ता को बेचैन करता है, क्योंकि यह वाक्य पूरी व्यवस्था की जड़ों पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
अंबेडकरवादी पीठ का अंत : दलित चेतना को कुचलने की कोशिश
राजस्थान की दक्षिणपंथी सरकार यह भली–भांति जानती है कि यदि दलित–आदिवासी समाज तालीम (शिक्षा) हासिल कर ले, अगर वह इतिहास को अपने नज़रिए (दृष्टिकोण) से पढ़ने लगे और संविधान को अपना वेपन (हथियार) बना ले, तो सत्ता की नींव हिलनी तय है। अंबेडकरवादी पीठ दलित चेतना को जागरूकता दे रही थी, जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा थ्रेट है।
सरकार समझती है कि ऐसे में मंदिर की सीढ़ियाँ डगमगाएँगी, सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोगों की ऑथॉरिटी (सत्ता) कमजोर होगी और सवर्ण वर्चस्व का पूरा सिस्टम चरमरा जाएगा। यही कारण है कि एक प्लान्ड (योजनाबद्ध) फैसले के तहत इस पीठ को समाप्त किया गया। यह कदम प्रशासनिक नहीं, बल्कि दलित–बहुजन चेतना को कुचलने की एक साज़िश है, जिसे अंबेडकरवादी आंदोलन कभी स्वीकार नहीं करेगा।
यह हमला सिर्फ़ एक पीठ पर नहीं है।
जो लोग इसे केवल एक अकादमिक यूनिट (शैक्षणिक इकाई) का बंद होना मान रहे हैं, वे या तो सादा-दिल (भोले) हैं या सत्ता के पार्टनर । आज निशाने पर अंबेडकरवादी पीठ है, कल सोशल जस्टिस सेंटर (सामाजिक न्याय केंद्र), वुमन स्टडीज़ डिपार्टमेंट (महिला अध्ययन विभाग), माइनॉरिटी डिस्कोर्स (अल्पसंख्यक विमर्श) और ट्राइबल राइट्स (आदिवासी अधिकार) होंगे। यह कोई इत्तेफ़ाक़ (संयोग) नहीं, बल्कि एक प्लान्ड (योजनाबद्ध) प्रक्रिया है। सत्ता जानती है कि वैचारिक संस्थानों को खत्म किए बिना वर्चस्व कायम नहीं रह सकता। इसलिए यह पूरी कवायद एक स्लो जेनोसाइड (धीमी वैचारिक हत्या) है, जिसमें किताबें नहीं जलाई जातीं, बल्कि चेतनाएँ कुचली जाती हैं। यह हमला ज्ञान पर है, सवालों पर है और उस सोच पर है जो बराबरी और इंसाफ़ (न्याय) की बात करती है।
प्रतीकात्मक अंबेडकरवाद : सबसे बड़ा धोखा
माल्यार्पण, जयंती, पोस्टर और भाषण— ये सब केवल तमाशा (दिखावा) और फ्रॉड हैं। जो सत्ता अंबेडकर के नाम पर वोट बटोरती है, लेकिन उनके विचारों से ख़ौफ़ खाती है, वह सच्ची श्रद्धा नहीं, बल्कि मक्कारी (धोखेबाज़ी) करती है। ऐसी सरकार अंबेडकर को प्रतीक बनाकर पेश करती है, पर उनके अनुयायियों को कुचलने में ज़रा भी हिचकती नहीं। यह वही डबल स्टैंडर्ड (दोहरा मापदंड) है, जहाँ मंच पर सम्मान और ज़मीन पर अपमान साथ–साथ चलता है। अंबेडकरवाद को फूलों से नहीं, बल्कि इंसाफ़ , बराबरी और संविधान (कानून) को लागू करके सम्मान दिया जाता है; बाकी सब केवल सत्ता की स्ट्रैटेजी है, जो दलित–बहुजन समाज को भ्रम में रखने के लिए रची जाती है।
वह सरकार केवल अंबेडकर विरोधी ही नहीं, बल्कि खुलकर संविधान विरोधी है। सवाल साफ़ है—यह निर्णय किसके हित में है? इस फैसले से फ़ायदा पहुँचता है सवर्ण प्रभुत्व, ब्राह्मणवादी नैरेटिव (कथा) और जाति आधारित सत्ता को, जो समाज को बराबरी की ओर नहीं जाने देना चाहती। वहीं इसका सीधा नुकसान दलित छात्रों, बहुजन रिसर्च (शोध) और डेमोक्रेटिक कॉन्शियसनेस (लोकतांत्रिक चेतना) को होता है। यह कोई न्यूट्रल (तटस्थ) निर्णय नहीं है, बल्कि पूरी तरह क्लास-स्पेसिफिक (खास वर्ग के पक्ष में) है। सत्ता जानती है कि अगर दलित–बहुजन समाज चेतनाऔर नॉलेज (ज्ञान) से लैस हो गया, तो वर्चस्व की इमारत ढह जाएगी। इसलिए यह फैसला सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि हुक़्मरानी (दबदबे) को बचाने की कोशिश है।
ऐलान
हम यह स्पष्ट कहते हैं—
अंबेडकरवाद कोई सिलेबस (पाठ्यक्रम) नहीं, बल्कि संघर्ष की विचारधारा है।
इसे पीठ बंद करके नहीं रोका जा सकता,
इसे किसी ऑर्डर (आदेश) से मिटाया नहीं जा सकता।
अगर विश्वविद्यालय बंद होंगे,
तो सड़कें खुलेंगी।
अगर शोध रोका जाएगा,
तो आंदोलन खड़ा होगा।
अंबेडकरवाद डर से नहीं,
डेमोक्रेसी (लोकतंत्र), संविधान (कानून) और बराबरी से चलता है।
यह चेतना है, और चेतना को न ताले लगते हैं,
न प्रतिबंध।
यह लड़ाई केवल शिक्षा की नहीं है। यह लड़ाई इज़्ज़त की है, बराबरी (समानता) की है और मनुष्य होने के राइट (अधिकार) की है। यह संघर्ष उस डिग्निटी (मानवीय गरिमा) के लिए है, जिसे सदियों से जाति के नाम पर कुचला गया। डॉ. अंबेडकर ने साफ़ कहा था—
“मैं ऐसे धर्म को नहीं मानता जो लिबर्टी (स्वतंत्रता), इक्वैलिटी (समानता) और फ्रेटरनिटी (बंधुत्व) न सिखाए।”
आज हम भी उतनी ही वाज़ेह (स्पष्ट) भाषा में कहते हैं—हम ऐसी सत्ता को नहीं मानते जो अंबेडकरवादी विचार से ख़ौफ़ खाती हो। जो सरकार संविधान से डरती है, वह डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) की नहीं, बल्कि वर्चस्व की राजनीति करती है। अंबेडकरवाद किसी की कृपा पर नहीं, बल्कि संघर्ष और चेतना की ताक़त पर खड़ा है।
निष्कर्ष : चेतावनी, विनती नहीं
राजस्थान की सरकार यह स्पष्ट) समझ ले कि अंबेडकरवादी आंदोलन चुप नहीं बैठेगा। यह न दरख़्वास्त (याचना) करता है, न कृपा (अनुग्रह) माँगता है। यह राइट्स (अधिकार) की भाषा बोलता है, कॉन्स्टिट्यूशन (संविधान) की भाषा बोलता है और ज़रूरत पड़ी तो रोड टू पार्लियामेंट (सड़क से संसद) तक संघर्ष करता है। सत्ता यह न भूले कि पीठें डिमॉलिश (ढहाई) की जा सकती हैं, लेकिन विचार नहीं। अंबेडकरवाद किसी ऑर्डर (आदेश) से नहीं रुकता, न किसी प्रेशर (दबाव) से झुकता है। यह चेतना है, और चेतना को कैद नहीं किया जा सकता। अंबेडकर को रोका जा सकता है? कभी नहीं।
संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
स्रोत व संदर्भ
संविधान, डॉ. अंबेडकर के भाषण-लेखन, सामाजिक न्याय रिपोर्टें, विश्वविद्यालय निर्णय, दलित-बहुजन आंदोलन साहित्य, समकालीन राजनीतिक विश्लेषण।
