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“अकादमिक स्वतंत्रता, नैतिक साहस और तथ्य आधारित हस्तक्षेप की अनिवार्य सामाजिक भूमिका!”

भूमिका एक समाचारपत्र में उल्लेख है कि एआई समिट में हुए युवा कांग्रेस के प्रदर्शन की 160 शिक्षाविदों ने निंदा की। प्रश्न केवल एक घटना का नहीं, बल्कि व्यापक जिम्मेदारी…

“अकेलेपन की भूख से आत्मा के उत्सव तक की अंतर्मुखी आध्यात्मिक यात्रा!”

जब साथ की चाह मिटे और आत्मबोध की ज्योति स्वयं प्रज्वलित हो जब कैसे महसूस होता है?अकेलापन और एकांत देखने में समान प्रतीत होते हैं, पर उनके अर्थ और प्रभाव…

“अगर मंदिर-मस्जिद और पड़ोसी दुश्मनी खत्म हो जाए तो न्यूज़रूम में सन्नाटा छा जाएगा!”

कहते हैं कि पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होते हैं। पर हमारे कुछ महाशय ऐसे हैं जिनके लिए यह स्तंभ नहीं, “स्टूडियो का स्टंट” है। कल्पना कीजिए, अगर देश में…

” स्त्री के अस्तित्व पर समाज की कसौटी और दोहरे मापदंडों का कठोर सच!”

समाज की रिवायत (परंपरा) ने स्त्री के जीवन को एक अदृश्य घेरे में बाँध रखा है। यह घेरा किसी स्टैंडर्ड (मापदंड) की तरह काम करता है, जहाँ हर मुस्कान, हर…

‘संवेदनाओं की तपिश में पका हुआ युवक और जीवनसंगिनी की अनकही चाह!”

मैं पैंतीस वर्ष का एक साधारण युवक हूँ। जीवन की इस अवस्था में जब अधिकतर मित्र अपनी-अपनी गृहस्थी में रच-बस गए हैं, मैं अब भी प्रतीक्षा में खड़ा हूँ। कभी-कभी…

” विश्वास और वफ़ा के बिना प्रेम का कोई वृतांत पूर्ण नहीं हो सकता?”

जब लफ्ज़ कागज़ पर उतरते हैं तो वे केवल अभिव्यक्ति नहीं रहते, वे जीवन का वृतांत बन जाते हैं। हर रिश्ता भी एक जीवंत कहानी है, जिसे समय अपनी स्याही…

“भौतिक सफलता बनाम आंतरिक शांति: आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी आध्यात्मिक दुविधा?”

आँख नींद मांग रही है, दिमाग़ दौलत… दिल प्यार… और रूह सुकूनमनुष्य एक अद्भुत संगम है—शरीर, मन, दिल और आत्मा का। लेकिन जब ये चारों एक ही दिशा में न…

“हुनर रखो सच और झूठ परखने का, क्योंकिकानों में ज़हर घोलना काम है ज़माने का…”

भारतीय समाज एक विराट वृक्ष की तरह है—जड़ों में परंपरा, तने में संस्कार और शाखाओं में संबंधों की हरियाली। किंतु इसी वृक्ष के भीतर कहीं-कहीं दीमक भी लग जाती है,…

“जब शब्द बनते हैं हथियार, और इंसानियत को सरेआम जलील किया जाता है!”

कांटे तो बस यूँ ही बदनाम हैं, लोगों को चुभती तो ‘बातें’ ज़्यादा हैं ! प्रकृति के कांटे दिखाई देते हैं, इसलिए उनसे बचाव संभव है; पर मनुष्य की वाणी…

“हस्ताक्षर मिट जाते हैं समय की धूल में, पर सच्चा प्रेम चेतना पर शाश्वत अंकन करता है!”

“याद रहे… प्रेम अनपढ़ है, ये हस्ताक्षर नहीं करता, छाप छोड़ता है।” यह पंक्ति प्रेम की उस मौलिक प्रकृति को उजागर करती है, जो औपचारिकताओं से परे है। प्रेम किसी…