जातिवाद: योग्यता और गरिमा पर प्रहार
जातिवाद की मानसिकता किसी भी सभ्य समाज के लिए एक कैंसर की तरह है। जब कोई व्यक्ति किसी की मेहनत और पद को उसकी काबिलियत के बजाय उसकी जाति या आरक्षण से जोड़कर देखता है, तो वह न केवल उस व्यक्ति का अपमान करता है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों को भी चुनौती देता है।
यह घटना समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है, जहाँ उच्च पदों पर बैठे शिक्षित व्यक्ति भी अपनी संकीर्ण और जातिवादी मानसिकता को त्याग नहीं पाए हैं। राजस्थान पुलिस मुख्यालय जैसी गरिमामय जगह पर एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा दूसरे अधिकारी पर ‘आरक्षण’ को लेकर की गई टिप्पणी केवल एक व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि एक घृणित सामाजिक मानसिकता का परिचायक है।
1 पद नहीं, मानसिकता का प्रश्न
यह घटना दर्शाती है कि जातिवाद केवल अनपढ़ या ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है। जब एक अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (Additional SP) स्तर का अधिकारी अपने ही सहयोगी के विरुद्ध जातिगत टिप्पणी करता है, तो स्पष्ट होता है कि शिक्षा और ऊँचे पद भी व्यक्ति के भीतर जमी ‘जातिगत श्रेष्ठता’ के अहंकार को खत्म नहीं कर पाए हैं।
2 योग्यता बनाम आरक्षण का छद्म तर्क
अक्सर ‘आरक्षण’ का नाम लेकर किसी व्यक्ति की योग्यता पर सवाल उठाना एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
यह भूल जाना कि आरक्षित वर्ग से आने वाला व्यक्ति भी कठिन चयन प्रक्रियाओं और वर्षों के अनुभव के बाद उस मुकाम पर पहुँचा है, उसकी बौद्धिक क्षमता का अपमान है।
3 कार्य स्थल पर मानसिक उत्पीड़न
एक आधिकारिक बैठक में जहाँ प्रदेश की सुरक्षा और तकनीकी सेवाओं पर चर्चा हो रही हो, वहाँ किसी अधिकारी को उसकी जाति के आधार पर नीचा दिखाना कार्यस्थल के माहौल को विषाक्त बनाता है।
यह अन्य अधिकारियों के मनोबल को गिराता है और संगठन की एकता को खंडित करता है।
”किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर आंकना, आपकी अपनी बौद्धिक दरिद्रता का प्रमाण है।”
सुधार की आवश्यकता
ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए केवल कानून (SC/ST Act) काफी नहीं है, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों की भी जरूरत है:
संवेदनशीलता प्रशिक्षण
पुलिस और प्रशासनिक सेवाओं में समय-समय पर ‘Sensitization’ वर्कशॉप होनी चाहिए।
त्वरित कार्रवाई
इस मामले में FIR दर्ज होना एक सही कदम है, लेकिन दोषियों को विभागीय दंड मिलना भी अनिवार्य है ताकि एक नजीर पेश की जा सके।
मानसिक बदलाव
हमें यह स्वीकार करना होगा कि आरक्षण कोई दान नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय को ठीक करने और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का एक संवैधानिक प्रावधान है।
निष्कर्ष
दौलतराम अटल के साथ हुई यह घटना हमें चेतावनी देती है,कि हम 21वीं सदी में भले ही पहुँच गए हों, लेकिन मानसिक रूप से अभी भी सदियों पुरानी बेड़ियों में जकड़े हुए हैं। जब तक हम ‘जाति’ के चश्मे को उतारकर ‘इंसान’ और उसके ‘कार्य’ को देखना नहीं सीखेंगे, तब तक हमारा समाज पूर्णतः विकसित नहीं कहला सकता।

लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES)
सामाजिक कार्यकर्ता एवं चिन्तक ब्यावर -MO -94622-60179
sohanlalsingaria@gmail.com
