इतिहास केवल तारीखों का संकलन नहीं होता, बल्कि उन क्रांतियों का गवाह होता है, जिन्होंने मानवता को दासता की बेड़ियों से मुक्त किया।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का संपूर्ण जीवन ऐसी ही एक महान वैचारिक क्रांति का प्रतीक है।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय की वह घटना जहाँ बाबासाहेब ने ‘महापुरुष की अमरता’ की परिभाषा को चुनौती दी थी—आज हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा आईना है।
बाबासाहेब ने स्पष्ट कहा था कि, महापुरुष तब तक जीवित है, जब तक उसके विचार जीवित हैं।
परंतु आज जब हम अपने समाज के व्यवहार का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं, तो एक भयावह सत्य उभर कर आता है: हम बाबासाहेब के दिए ‘संवैधानिक अधिकारों’ का लाभ तो ले रहे हैं, लेकिन उनके ‘वैचारिक सिद्धांतों’ की हर कदम पर हत्या कर रहे हैं। यह स्थिति कृतज्ञता की नहीं, बल्कि घोर पाखण्ड की है।
1. कृतज्ञता का अभाव
अधिकार बाबासाहेब के,
आस्था पाखण्ड की
आज समाज का एक बड़ा वर्ग आरक्षण और बाबासाहेब के संघर्ष की बदौलत उच्च प्रशासनिक पदों, शिक्षा और आर्थिक समृद्धि तक पहुँचा है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस कलम की ताकत ने हमें फर्श से अर्श तक पहुँचाया, हम उसकी कृतज्ञता भूलकर उन शक्तियों के सामने नतमस्तक हैं, जिन्होंने सदियों तक हमें शिक्षा के अधिकार
से वंचित रखा।
हम सरकारी नौकरी लगने पर, पदोन्नति होने पर या घर में खुशी का अवसर आने पर ‘सवामणि’ का आयोजन करते हैं, उन मंदिरों और देवी-देवताओं को हजारों-लाखों रुपये चढ़ा देते हैं, जिनका हमारे सामाजिक उत्थान में कोई तार्किक योगदान नहीं रहा।
यह कड़वा सच है कि हम माल किसी का खाते हैं और गुणगान किसी और का करते हैं
जिस धन को समाज के अंतिम पंक्ति के सबसे पिछड़े व्यक्ति की शिक्षा और उत्थान के लिए खर्च होना चाहिए था, वह धन हम अंधविश्वास और पाखण्ड की भेंट चढ़ा देते हैं।
यह कृतज्ञता नहीं, बल्कि उस महापुरुष के साथ वैचारिक विश्वासघात है, जिसने हमें मनुष्य होने का अधिकार दिलाया।
2. दिखावे की संस्कृति और आर्थिक बर्बादी
हमारा समाज आज प्रदर्शन’ (Show-off) की एक ऐसी अंधी दौड़ में शामिल हो गया है, जहाँ विवेक पूरी तरह लुप्त है।
हम मृत्यु-भोज जैसी कुरीतियों, दिखावे की शादियों और व्यर्थ के धार्मिक आयोजनों में आंख बंद करके अनाप-शनाप खर्च कर देते हैं।
दूतों और पाखण्डों पर व्यय
मंदिरों के निर्माण या भंडारों के लिए चंदा मांगने पर हम गर्व से हजारों रुपये दे देते हैं, लेकिन जब ‘पे-बैक टू सोसाइटी’ के तहत समाज के किसी पिछड़े वर्ग के बच्चे को उठाने या किसी मेधावी छात्र की सहायता की बात आती है, तो हम ‘हिम्मत’ नहीं जुटा पाते।
शिक्षा बनाम आडंबर
हम एक शादी में दिखावे के लिए लाखों रुपये पानी की तरह बहा देंगे, लेकिन अपने ही बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए सर्वश्रेष्ठ संस्थान या गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सामग्री पर निवेश करने से कतराते हैं।
शिक्षा पर किया गया खर्च हमें ‘बोझ’ लगता है, जबकि पाखण्ड पर किया गया खर्च हमें ‘सम्मान’ का प्रतीक लगता है। यह वैचारिक भटकाव ही हमारी प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।
3. सामाजिक ईर्ष्या और द्वेष: संगठन की जड़ों में विष
बाबासाहेब ने ‘संगठित रहो’ का नारा दिया था, जिसका आधार आपसी बंधुत्व (Fraternity) था।
परंतु धरातल पर स्थिति बिल्कुल विपरीत है। आज हमारे समाज के भीतर एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या और द्वेष की भावना घर कर गई है।
जब हमारे ही समाज का कोई भाई, कोई अधिकारी या कोई युवा तरक्की करता है, तो समाज के लोग गौरवान्वित होने के बजाय उससे जलने लगते हैं। हम इस बात से अधिक दुखी रहते हैं कि “वह आगे कैसे निकल गया?” बजाय इसके कि हम उसके साथ खड़े हों, हम उसकी राह में रोड़े अटकाते हैं, बाधाएं उत्पन्न करते हैं और उसे नीचे खींचने की योजनाएं बनाते हैं।
यह ‘टांग खिंचाई’ की संस्कृति हमें कभी एक सशक्त शक्ति (Power) नहीं बनने देगी। जब तक हम अपने ही भाइयों की सफलता को अपनी सफलता नहीं मानेंगे, तब तक हमारा ‘संगठित’ होना एक कोरा स्वप्न ही रहेगा।
4. मंदिर की भीड़ बनाम विद्यालय की राह
एक शिक्षाविद के रूप में मेरा यह दृढ़ विश्वास है, कि समाज का भाग्य मंदिरों में नहीं, बल्कि विद्यालयों में लिखा जाता है।
हमें मंदिरों की ओर जाने वाली उस विशाल भीड़ को मोड़कर पुस्तकालयों और शोध संस्थानों की ओर ले जाना होगा।
बाबासाहेब को ‘पूजने’ या उन्हें ‘भगवान’ मानकर अगरबत्ती लगाने से समाज का भला नहीं होने वाला।
वे पूजने की नहीं, पढ़ने और
समझने की वस्तु हैं।
भगवान मानने की प्रक्रिया दरअसल किसी महापुरुष के विचारों से बचने का सबसे आसान तरीका है।
जब हम किसी को भगवान मान लेते हैं, तो हम यह सोचकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि “वे तो चमत्कार कर सकते थे, हम तो साधारण मनुष्य हैं।
बाबासाहेब को भगवान नहीं, अपना ‘वैचारिक पथ-प्रदर्शक’ मानिए और उनके बताए प्रज्ञा, शील, और मैत्री जैसे गुणों को व्यावहारिक रूप से अपने जीवन में लागू कीजिए।
5. पे-बैक टू सोसाइटी: वास्तविक उत्तरदायित्व
शिक्षित होने की सार्थकता डिग्रियां बटोरने में नहीं, बल्कि इस बात में है कि हम अपने समाज को अंधविश्वास और पाखण्ड के अंधकार से बाहर निकालने में कितने सहायक हुए।
‘पे-बैक टू सोसाइटी’ का अर्थ केवल धन देना नहीं, बल्कि अपनी बौद्धिक क्षमता और समय कानिवेश करना भी है*
हमे समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को आगे बढ़ाने के लिए धरातल पर कार्य करना होगा। यदि समाज के शीर्ष पर बैठा वर्ग (अधिकारी और प्रबुद्ध वर्ग) अपने लोगों के प्रति ईमानदार नहीं है, तो वह समाज कभी दीर्घकालिक उन्नति नहीं कर सकता।
हमें अपने लोगों के साथ पूर्णतः ईमानदार रहना पड़ेगा और उनके उत्थान हेतु आवश्यक एवं व्यावहारिक कदम उठाने होंगे।
6. आस्तिकता से वास्तविकता की ओर
आज हमें ‘आस्तिक’ (Believer) समाज से वास्तविक’ (Rationalist) समाज बनने की ओर प्रस्थान करना होगा।
आस्तिकता हमें भाग्यवादी बनाती है, जबकि वास्तविकता हमें कर्मशील बनाती है। हमें यह समझना होगा कि हमारी दुर्दशा का कारण ‘ग्रह-नक्षत्र’ नहीं, बल्कि ‘अशिक्षा और एकता का अभाव’ है
पाखण्ड में अनाप-शनाप खर्च करना बंद कीजिए और उस धन को अपने बच्चों की तकनीकी शिक्षा, कौशल विकास और वैचारिक चेतना पर खर्च कीजिए।
7. निष्कर्ष: आचरण ही असली श्रद्धांजलि है
निष्कर्षतः, अम्बेडकर जयन्ती मनाना या अम्बेडकरवाद की बातें करना तभी सार्थक होगा जब बाबासाहेब के विचार हमारे व्यावहारिक जीवन में नजर आएं। जिस दिन हमारे व्यवहार में पाखण्ड की जगह तर्क, ईर्ष्या की जगह सहयोग, और प्रदर्शन की जगह सेवा ले लेगी, उसी दिन वास्तविक ‘अम्बेडकरवाद’ स्थापित होगा।
दिखावे की इन शादियों, मृत्यु-भोजों और धार्मिक पाखण्डों को त्यागकर, उस धन को समाज की ‘शिक्षा निधि’ में लगाइए। अपने भाइयों की राह का कांटा नहीं, बल्कि उनके सफर का हमसफर बनिए।
याद रखिए, “अम्बेडकरवाद एक कोट-पैंट पहनने का फैशन नहीं, बल्कि एक चरित्र है। आइए, संकल्प लें कि हम अपने बच्चों को विद्यालयों के प्रति जागरूक करेंगे, पाखण्ड की बेड़ियों को तोड़ेंगे और समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए ईमानदारी से धरातल पर कार्य करेंगे। वही बाबासाहेब के प्रति हमारी सच्ची कृतज्ञता होगी। वही असली पूजा है, वही वास्तविक जयन्ती है।

लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
शिक्षाविद,सामाजिक चिन्तक एवं विश्लेषक ब्यावर-305901
