भारत की अर्थव्यवस्था इन दिनों अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी हुई है। प्रसिद्ध पत्रिका The Economist ने हाल ही में एक विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित किया जिसमें कहा गया कि भारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है या पाँचवीं, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। यह टिप्पणी केवल एक आर्थिक आंकड़े पर सवाल नहीं उठाती बल्कि हमारी सोच को भी चुनौती देती है। अक्सर हम बड़े आर्थिक आंकड़ों को देखकर ख़ुशी (आनंद) महसूस करते हैं, लेकिन असली इकोनॉमी (अर्थव्यवस्था) की मजबूती इस बात से तय होती है कि आम नागरिक का जीवन कितना बेहतर हो रहा है।
पिछले कुछ समय में यह चर्चा जोर पकड़ती रही कि भारत ने जापान को पीछे छोड़ दिया है और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। सरकार और कई विश्लेषकों ने इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया। लेकिन बाद में नए आंकड़ों और पुनर्मूल्यांकन से यह सामने आया कि भारत अभी भी पाँचवें स्थान पर है और जापान से लगभग 300 बिलियन डॉलर पीछे है। यह अंतर बहुत बड़ा नहीं है और समय के साथ बदल सकता है। आर्थिक रैंकिंग में यह हक़ीक़त (सच्चाई) अक्सर विनिमय दर, गणना की विधि और वैश्विक बाजार की स्थिति पर निर्भर करती है। इसलिए केवल डेटा (सांख्यिकीय जानकारी) के आधार पर उत्सव मनाना समझदारी नहीं माना जा सकता।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कुल GDP का आकार किसी देश की ताकत का एक संकेत जरूर है, लेकिन यह पूर्ण तस्वीर नहीं दिखाता। भारत की आबादी लगभग 140 करोड़ है, इसलिए कुल उत्पादन बड़ा दिखाई देता है। परंतु जब इस GDP को आबादी से विभाजित किया जाता है तो प्रति व्यक्ति आय काफी कम निकलती है। यही वह फर्क़ (अंतर) है जो वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करता है। यदि किसी देश की कुल अर्थव्यवस्था बड़ी हो लेकिन नागरिकों की इनकम (आय) सीमित हो, तो उस देश की समृद्धि अधूरी मानी जाती है।
भारत अभी भी एक विकासशील देश है और यहाँ बड़ी संख्या में लोग गरीबी और असमानता से जूझ रहे हैं। शहरों में आधुनिक इमारतें, मेट्रो और चमकदार बाजार दिखाई देते हैं, लेकिन गाँवों और दूरदराज के इलाकों में लोगों को मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए आर्थिक नीति का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं बल्कि समाज में बराबरी (समानता) लाना भी होना चाहिए। यदि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक नहीं पहुँचता तो आर्थिक डेवलपमेंट (विकास) का दावा अधूरा ही रहेगा।
राजनीतिक नेतृत्व अक्सर बड़ी आर्थिक उपलब्धियों को जनता के सामने प्रस्तुत करता है। इससे राष्ट्रीय गर्व की भावना पैदा होती है, जो सकारात्मक भी हो सकती है। लेकिन जब जनता को रोजमर्रा की जिंदगी में महंगाई और बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है, तब यह उत्साह धीरे-धीरे निराशा में बदल सकता है। इस स्थिति में लोगों की उम्मीद (आशा) और वास्तविक प्रोग्रेस (उन्नति) के बीच दूरी दिखाई देने लगती है। यही कारण है कि आर्थिक उपलब्धियों की चर्चा करते समय संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
महंगाई आज के समय की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से एक है। जब खाद्यान्न, ईंधन और दैनिक जरूरत की चीजों की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका सीधा प्रभाव आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। एक मध्यमवर्गीय परिवार को अपने खर्चों का संतुलन बनाना कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में समाज में बेचैनी (अशांति) बढ़ती है और आर्थिक व्यवस्था पर भरोसा कम होने लगता है। यही कारण है कि अर्थशास्त्री इन्फ्लेशन (मूल्य वृद्धि) को नियंत्रित रखने पर जोर देते हैं।
भारत के सामने एक और बड़ी चुनौती है जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में मिडिल-इनकम ट्रैप कहा जाता है। इसका अर्थ है कि कोई देश मध्यम आय के स्तर तक पहुँचने के बाद आगे विकसित अर्थव्यवस्था बनने में असफल हो जाए। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए शिक्षा, अनुसंधान और उद्योग में निवेश बढ़ाना आवश्यक है। इसके लिए समाज में जुनून (दृढ़ उत्साह) और बेहतर इनोवेशन (नवाचार) की आवश्यकता होती है। जब नई तकनीक और नए विचार सामने आते हैं, तब ही अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे बढ़ती है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत को मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात के क्षेत्र में अधिक ध्यान देना चाहिए। जब देश में उद्योग बढ़ते हैं तो रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। इससे लाखों युवाओं को काम मिलता है और अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। उद्योगों के विस्तार से देश की तरक़्क़ी (उन्नति) तेज होती है और एक्सपोर्ट (विदेशों को वस्तुओं की बिक्री) के माध्यम से विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती है। यह किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इसके साथ ही बुनियादी ढांचे का विकास भी उतना ही आवश्यक है। सड़कें, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे और डिजिटल नेटवर्क आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। जब इन क्षेत्रों में निवेश होता है तो व्यापार और उद्योग को गति मिलती है। मजबूत आधारभूत संरचना किसी भी देश को आर्थिक रूप से आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह आर्थिक मंज़िल (लक्ष्य) तक पहुँचने का मार्ग तैयार करती है और बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर (आधारभूत संरचना) विकास को स्थायी बनाता है।
अंततः यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है कि क्या रैंकिंग ही विकास का अंतिम पैमाना है। यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था बड़ी हो लेकिन उसके नागरिकों का जीवन कठिन हो, तो वह प्रगति अधूरी है। वास्तविक सफलता तब है जब समाज का हर व्यक्ति सम्मानजनक जीवन जी सके। इसलिए हमें केवल आर्थिक आंकड़ों के उत्सव में नहीं बल्कि वास्तविक परिवर्तन में विश्वास करना चाहिए। यही आर्थिक सचाई (यथार्थ) है और यही किसी राष्ट्र की स्थायी सक्सेस (सफलता) का आधार भी है।
हकीकत का शेर :
अंकों की चमक में हमने खुशियों के शहर बसाए,
हक़ीक़त ने बताया अभी सफ़र में कितने इम्तिहान आए।
संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी ,रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक 98292 30966
स्रोत एवं संदर्भ :
शीतल पी सिंह की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित एवंThe Economist लेख, भारतीय अर्थव्यवस्था आँकड़े, IMF विश्व बैंक रिपोर्ट, GDP विश्लेषण, प्रति व्यक्ति आय अध्ययन, आर्थिक नीतियाँ, सार्वजनिक बहस।
