भूमिका
आधुनिक वैश्विक राजनीति में हर देश अपनी सुरक्षा, आर्थिक हितों और कूटनीतिक प्रभाव को मजबूत करने के लिए नई-नई रणनीतियाँ बनाता है। भारत ने भी पिछले एक दशक में अपनी विदेश नीति को “रणनीतिक स्वायत्तता” के सिद्धांत पर आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। इस नीति का मूल विचार यह है कि भारत किसी एक शक्ति पर निर्भर न रहे, बल्कि सभी प्रमुख देशों और समूहों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे। सरकार ने इसे भारत की कूटनीतिक परिपक्वता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता का प्रतीक बताया है। परंतु अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक मिहिर शर्मा ने इस नीति पर गंभीर प्रश्न उठाते हुए यह पूछा है कि क्या यह संतुलन वास्तव में ताकत है या फिर एक ऐसा भ्रम, जो भारत की प्रभावशीलता को कमजोर कर रहा है।

  1. “रणनीतिक स्वायत्तता” की अवधारणा!

भारत की विदेश नीति में “रणनीतिक स्वायत्तता” का विचार यह संकेत देता है कि देश किसी एक महाशक्ति की ताबेदारी (आज्ञाकारिता) में बंधकर निर्णय नहीं लेना चाहता। इस सिद्धांत के अनुसार भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए स्वतंत्र कूटनीतिक दिशा तय करना चाहता है। वैश्विक मंचों पर भारत की स्ट्रैटेजी (रणनीति) यह बताने की कोशिश करती है कि मित्रता सबके साथ हो सकती है, पर निर्भरता किसी एक पर नहीं होनी चाहिए। इस सोच में यह भी निहित है कि बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में लचीलापन बनाए रखना जरूरी है, ताकि देश अपनी संप्रभुता और निर्णय क्षमता को सुरक्षित रखते हुए संतुलित संबंध कायम रख सके।

  1. अनेक वैश्विक मंचों पर भारत की सक्रियता!

पिछले दस वर्षों में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी मौजूदगी को काफी बढ़ाया है। अमेरिका के साथ Quad, चीन और मध्य एशियाई देशों के साथ SCO, रूस और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ BRICS तथा इज़राइल और यूएई के साथ I2U2 जैसे मंचों में भारत की भागीदारी दिखाई देती है। सरकार इसे बहुआयामी कूटनीति की कोशिश (प्रयास) के रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे विभिन्न देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए जा सकें। इन मंचों पर भारत की सक्रिय पार्टिसिपेशन (भागीदारी) यह संदेश देने की कोशिश करती है कि देश वैश्विक राजनीति में अलग-अलग शक्तियों के साथ संवाद बनाए रखते हुए अपने हितों की रक्षा करना चाहता है।

  1. “सबके साथ दोस्ती” का दावा?

सरकार और उसके समर्थक लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि भारत की विदेश नीति का मूल भाव है—सबके साथ मित्रता, लेकिन किसी पर निर्भरता नहीं। इस सोच को भारत की कूटनीतिक खुदमुख्तारी (स्वतंत्रता) का प्रतीक बताया जाता है, जहाँ देश अपने हितों को ध्यान में रखते हुए सभी शक्तियों से संबंध बनाए रखता है। इस विचार के अनुसार भारत किसी एक गुट में बंधने के बजाय संतुलन बनाए रखना चाहता है। इसे वैश्विक मंचों पर भारत की स्वतंत्र डिप्लोमेसी (कूटनीति) की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया है, ताकि बदलती विश्व राजनीति में देश अपनी निर्णय क्षमता को सुरक्षित रख सके।

  1. इज़राइल और ईरान के बीच संतुलन की चुनौती!

मध्य-पूर्व की राजनीति में भारत की स्थिति लगातार जटिल होती जा रही है। एक ओर भारत के इज़राइल के साथ रक्षा, तकनीक और कृषि सहयोग के मजबूत संबंध हैं, तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा और क्षेत्रीय संपर्क की आवश्यकताएँ भी जुड़ी हुई हैं। इस परिस्थिति में दोनों देशों के बीच संतुलन बनाए रखना कूटनीति की बड़ी दिक्कत (समस्या) बन गया है। यदि किसी एक पक्ष के साथ निकटता बढ़ती है तो दूसरे पक्ष में डाउट (संदेह) पैदा होने लगता है। यही कारण है कि भारत को हर कदम सोच-समझकर उठाना पड़ता है, ताकि उसके दीर्घकालिक रणनीतिक हित प्रभावित न हों।

  1. इज़राइल के साथ निकटता की सीमाएँ?

दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत और इज़राइल के बीच रक्षा व तकनीकी सहयोग के बावजूद वह स्तर का भरोसा अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है, जहाँ बड़े क्षेत्रीय संकटों या संभावित युद्ध से पहले भारत को विश्वास में लिया जाए। यह स्थिति बताती है कि संबंधों की हकीकत (वास्तविकता) केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि गहरे विश्वास से बनती है। कई बार कूटनीतिक निकटता के बावजूद प्रभाव सीमित ही रह जाता है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय इन्फ्लुएंस (प्रभाव) का वास्तविक आकलन केवल साझेदारी से नहीं, बल्कि संकट के समय मिलने वाली प्राथमिकता से किया जाता है।

  1. खाड़ी देशों में भारतीयों की बड़ी संख्या!

खाड़ी क्षेत्र में लगभग 90 लाख भारतीय काम करते हैं और यह समुदाय भारत की अर्थव्यवस्था तथा प्रवासी नीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उनकी मेहनत से आने वाली विदेशी मुद्रा देश की आर्थिक मजबूती में बड़ा योगदान देती है। फिर भी संकट के समय सुरक्षा और संरक्षण को लेकर कई प्रकार की फिक्र (चिंता) सामने आती है। यदि किसी क्षेत्रीय तनाव या युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाए तो इन लाखों भारतीयों की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। ऐसे समय में भारत की वैश्विक कैपेबिलिटी (क्षमता) और कूटनीतिक प्रभाव की वास्तविक परीक्षा होती है।

  1. अमेरिका की क्षेत्रीय नीतियों से दूरी!

अमेरिका मध्य-पूर्व की राजनीति में एक प्रमुख शक्ति माना जाता है और उसके कई फैसलों का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ता है। कई बार उसके निर्णयों से वहां अस्थिरता और तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे महत्वपूर्ण कदम उठाते समय भारत को न तो औपचारिक मशविरा (परामर्श) दिया जाता है और न ही पहले से कोई संकेत मिलता है। इससे यह धारणा बनती है कि भारत की क्षेत्रीय भूमिका सीमित है। इस स्थिति में भारत की अंतरराष्ट्रीय पोज़िशन (स्थिति) को लेकर भी सवाल उठते हैं कि क्या उसकी कूटनीतिक उपस्थिति पर्याप्त प्रभावशाली है।

  1. रणनीतिक परियोजनाओं पर असर!

भारत की संतुलन आधारित विदेश नीति का प्रभाव कुछ महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर भी दिखाई देता है। कई बार अलग-अलग शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश में योजनाओं की गति धीमी पड़ जाती है। उदाहरण के रूप में ईरान में चाबहार पोर्ट परियोजना को वह रफ्तार नहीं मिल सकी जिसकी पहले उम्मीद की जा रही थी। इससे क्षेत्रीय संपर्क और व्यापारिक संभावनाओं पर भी असर पड़ा है। कई विश्लेषक मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और कूटनीतिक पेचीदगी (जटिलता) के कारण ऐसे प्रोजेक्ट अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाए। परिणामस्वरूप भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी (संपर्क व्यवस्था) को मजबूत करने की योजनाएँ भी प्रभावित होती दिखाई देती हैं।

  1. व्यापारिक बाजारों पर प्रभाव!

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और कूटनीतिक संतुलन की नीति का असर भारत के व्यापारिक बाजारों पर भी दिखाई देता है। विशेषकर कृषि उत्पादों के निर्यात में कई बार अनिश्चितता की स्थिति बन जाती है। चावल जैसे महत्वपूर्ण निर्यात बाजारों में मांग और भरोसे को लेकर बेचैनी (अस्थिरता) महसूस की गई है। जब वैश्विक संबंधों में संतुलन साधने की कोशिश होती है, तब व्यापारिक निर्णय भी प्रभावित हो सकते हैं। इसी कारण कई विशेषज्ञ यह सवाल उठाते हैं कि भारत की अंतरराष्ट्रीय ट्रेड (व्यापार) नीति को किस प्रकार अधिक स्थिर और भरोसेमंद बनाया जाए ताकि निर्यात बाजार मजबूत बने रहें।

  1. “हर जगह दोस्त, लेकिन प्रभाव सीमित”!

इस नीति पर सबसे बड़ी आलोचना यही सामने आती है कि भारत के लगभग सभी देशों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध दिखाई देते हैं, लेकिन किसी बड़े संकट या निर्णायक क्षण में उसका ठोस प्रभाव स्पष्ट नहीं दिखता। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल मित्रता पर्याप्त नहीं होती, बल्कि भरोसे और प्रभाव की गहराई भी जरूरी होती है। कई विश्लेषकों का कहना है कि यह स्थिति कहीं न कहीं कूटनीतिक कमजोरी (निर्बलता) का संकेत देती है। यदि संबंध मजबूत हों तो वैश्विक निर्णयों और क्षेत्रीय घटनाओं पर भारत की इम्पैक्ट (प्रभावकारी शक्ति) भी स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए।

  1. खाड़ी संकट और भारतीय नागरिक

हाल के घटनाक्रम में खाड़ी क्षेत्र से लगभग 50,000 भारतीयों को वापस लौटना पड़ा, जबकि लाखों लोग अब भी संभावित खतरे के बीच काम कर रहे हैं। यह स्थिति प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और सम्मान को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। जब किसी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो सबसे पहले वहाँ काम कर रहे मजदूरों और कर्मचारियों की हिफ़ाज़त (सुरक्षा) चिंता का विषय बन जाती है। ऐसे समय में सरकार की नीतियों और कूटनीतिक प्रयासों की वास्तविक परीक्षा होती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ भारत की वैश्विक सेफ्टी (सुरक्षा व्यवस्था) क्षमता को और मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल देते हैं।

  1. मूल प्रश्न

इन सभी परिस्थितियों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही उभरता है कि क्या “सबके साथ संतुलन” की नीति वास्तव में प्रभावशाली कूटनीति है, या यह धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बना रही है जहाँ किसी भी देश के साथ रिश्ते पर्याप्त गहराई तक नहीं पहुँच पा रहे। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल औपचारिक मित्रता से काम नहीं चलता, बल्कि भरोसे और साझेदारी की स्थायी बुनियाद (आधार) भी आवश्यक होती है। यदि संबंध गहरे न हों तो संकट के समय सहयोग सीमित रह जाता है। इसलिए आज यह चर्चा तेज हो रही है कि भारत की वैश्विक लीडरशिप (नेतृत्व क्षमता) को मजबूत बनाने के लिए कूटनीति में किस प्रकार संतुलन और प्रभाव दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए।

समापन

भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” एक महत्वाकांक्षी और जटिल कूटनीतिक अवधारणा मानी जाती है, जिसका उद्देश्य देश को वैश्विक राजनीति में स्वतंत्र और संतुलित शक्ति के रूप में स्थापित करना है। परंतु अंतरराष्ट्रीय संबंधों की हकीकत (वास्तविक स्थिति) कई बार आदर्श सिद्धांतों से अधिक कठोर साबित होती है। मित्रता और संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन प्रभाव और भरोसे की स्थायी बुनियाद भी उतनी ही जरूरी होती है। आज समय यह संकेत दे रहा है कि भारत को अपनी विदेश नीति की उपलब्धियों और सीमाओं दोनों का गंभीर मूल्यांकन करना चाहिए। तभी वैश्विक मंच पर भारत की वास्तविक रोल (भूमिका) और प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आ सकेगा।

“दुनिया में मित्रता नहीं, हित स्थायी होते हैं; और हितों की रक्षा केवल प्रभाव और शक्ति से होती है।” हेनरी किसिंजर।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 230966

स्रोत व संदर्भ :
मिहिर शर्मा के लेख से प्रेरित, ब्लूमबर्ग ओपिनियन में प्रकाशित; भारत की स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी पर जियोपॉलिटिक्स विश्लेषण।

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