प्रस्तावना
भारतीय समाज के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व अवतरित होते हैं, जो अपनी मेधा, संघर्ष और अटूट इच्छाशक्ति से न केवल अपना भाग्य बदलते हैं, बल्कि पूरे समाज की दिशा और दशा को नई ऊंचाई प्रदान करते हैं।

रैगर समाज के ‘एकछत्र नेता’ और ‘युगपुरुष’ के रूप में विख्यात स्व० श्री धर्मदास शास्त्री (खटनावलिया) एक ऐसे ही दैदीप्यमान नक्षत्र थे।

उनका जीवन शून्य से शिखर तक पहुँचने की वह गाथा है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

10 मार्च, 1937 को जन्मा यह व्यक्तित्व 16 जनवरी, 2006 तक अपने कर्मों से समाज को आलोकित करता रहा।

जन्म और कठिन बचपन विभाजन की विभीषिका
श्री धर्मदास शास्त्री का जन्म अविभाजित भारत के सिंध (अब पाकिस्तान) के हैदराबाद में 10 मार्च, 1937 को हुआ था।

उनके पिता श्री नाथूरामजी खटनावलिया और माता श्रीमती सोनीदेवी एक साधारण और धर्मपरायण परिवार से थे।

नियति ने शास्त्री जी की परीक्षा बचपन से ही लेनी शुरू कर दी थी। 1947 में जब देश का विभाजन हुआ, तब लाखों परिवारों की तरह शास्त्री जी का परिवार भी अपनी पैतृक संपत्ति और जड़ों को छोड़कर शरणार्थी के रूप में भारत आया।

विभाजन की वह त्रासदी
कितनी भयानक रही होगी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है,कि उन्हें राजस्थान के बिजोलिया में एक शरणार्थी कैंप में लगभग एक साल तक रहना पड़ा।

अभावों और अनिश्चितताओं के उस दौर में भी उनके पिता ने साहस नहीं खोया। वर्ष 1948-49 में परिवार दिल्ली स्थानांतरित हो गया, जो आगे चलकर शास्त्री जी की कर्मभूमि बनी।

शिक्षा और बौद्धिक उत्कर्ष: ‘शास्त्री’ की उपाधि
दिल्ली में शास्त्री जी की शिक्षा-दीक्षा हुई। आर्थिक स्थिति अत्यंत विकट थी, लेकिन उनके भीतर ज्ञान की पिपासा शांत नहीं हुई थी।

उन्होंने ‘साहित्य अलंकार’ और ‘शास्त्री’ की परीक्षाएं ससम्मान उत्तीर्ण कीं। इसी ‘शास्त्री’ की उपाधि ने उन्हें समाज में एक नई पहचान दी और वे धर्मदास खटनावलिया से ‘धर्मदास शास्त्री’ के रूप में विख्यात हुए।

उन्होंने हिंदी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) की उपाधि भी प्राप्त की।
शिक्षा प्राप्ति के पश्चात परिवार की आजीविका चलाने के लिए उन्होंने लगभग 10 वर्षों तक दिल्ली पब्लिक कॉलेज में अध्यापन का कार्य किया।

एक शिक्षक के रूप में बिताए गए इन वर्षों ने उनके भीतर वह धैर्य, वाकपटुता और नेतृत्व क्षमता विकसित की, जिसने आगे चलकर उन्हें एक महान वक्ता
और राजनेता बनाया।

राजनैतिक पदार्पण: करोल बाग से संसद तक
शास्त्री जी का राजनैतिक सफर 1967 में शुरू हुआ, जब वे दिल्ली नगर निगम के सदस्य (पार्षद) चुने गए। उनकी सक्रियता और जनसेवा के प्रति समर्पण ने उन्हें जल्द ही कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की नजरों में ला दिया।

1977 में, जब देश में कांग्रेस के खिलाफ लहर थी, तब भी वे दिल्ली महानगर परिषद के सदस्य चुने गए और उन्हें विपक्ष का नेता बनने का गौरव प्राप्त हुआ।

एक दलित समाज के व्यक्ति के लिए दिल्ली की राजनीति में विपक्ष का नेता बनना उस दौर में एक
अभूतपूर्व उपलब्धि थी।

1980 का वर्ष उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। उन्होंने दिल्ली की सुरक्षित सीट ‘करोल बाग’ से लोकसभा का चुनाव लड़ा और भारी मतों से विजयी होकर संसद पहुँचे। वे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के इतने निकट थे कि उन्हें इंदिरा जी का ‘दाहिना हाथ’ माना जाता था।

दिल्ली की राजनीति में उनका प्रभाव
इतना व्यापक था कि सज्जन
कुमार जैसे कद्दावर नेता उन्हें
अपना राजनैतिक गुरु मानते थे।

रैगर समाज का संगठन और शक्ति प्रदर्शन
शास्त्री जी ने महसूस किया कि जब तक समाज संगठित नहीं होगा, तब तक सत्ता के गलियारों में उसकी बात नहीं सुनी जाएगी। उन्होंने अपने राजनैतिक रसूख का उपयोग समाज को गौरव दिलाने में किया।

जयपुर का चतुर्थ महासम्मेलन (1984): शास्त्री जी ने जयपुर के मानसरोवर में लाखों की भीड़ जुटाकर पूरी दुनिया को रैगर समाज की एकजुटता का परिचय दिया।

इस सम्मेलन की ऐतिहासिकता का प्रमाण यह था कि स्वयं प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी इसे संबोधित करने पहुंची थीं।

किसी दलित उपजाति के सम्मेलन में देश के प्रधानमंत्री का आना शास्त्री जी की राजनैतिक ताकत का परिचायक था।

विज्ञान भवन का पंचम महासम्मेलन
(1986): दिल्ली के प्रतिष्ठित ‘विज्ञान भवन’ में रैगर समाज का सम्मेलन करवाना किसी सपने से कम नहीं था। शास्त्री जी ने न केवल इसे आयोजित किया, बल्कि तत्कालीन राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जैल सिंह जी को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित कर समाज को गौरवान्वित किया।

सामाजिक सुधार और सम्मान की राजनीति
शास्त्री जी केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहे। 1984 से 2000 तक वे ‘अखिल भारतीय रैगर महासभा’ के निर्विवाद अध्यक्ष रहे।

उनके कार्यकाल को समाज का ‘स्वर्ण युग’ कहा जा सकता है।

उन्होंने समाज के संतों और महापुरुषों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाने का भगीरथ कार्य किया।

स्वामी ज्ञानस्वरूप जी महाराज: शास्त्री जी ने 1988 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति श्री शंकरदयाल शर्मा के कर-कमलों द्वारा स्वामी जी को ‘धर्मगुरु’ की उपाधि दिलवाई।

रैगर रत्न और भूषण
उन्होंने समाज के संतों (स्वामी आत्माराम जी, स्वामी रामानंद जी, स्वामी गोपालराम जी) को ‘रैगर रत्न’ और समाजसेवियों को ‘रैगर भूषण’ से राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित करवाया।

पारिवारिक जीवन और भव्य व्यक्तित्व
शास्त्री जी का विवाह 1956 में यशोदा देवी के साथ हुआ, जो समाज के प्रथम म्युनिसिपल कमिश्नर श्री भोलारामजी तोंणगरिया की सुपुत्री थीं। उनके परिवार में 2 पुत्र और 4 पुत्रियाँ हुईं।

शास्त्री जी ने अपनी संतानों को भी उच्च संस्कार दिए। 1982 में उनकी बड़ी पुत्री सावित्री का विवाह दिल्ली में हुआ, जो उस समय की सबसे चर्चित शादियों में से एक थी।

इस विवाह में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और कई राज्यों के मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल शामिल हुए थे। यह आयोजन शास्त्री जी के व्यापक सामाजिक और राजनैतिक संबंधों का जीवंत उदाहरण था।

संघर्ष और प्रतिकूल परिस्थितियाँ
सफलता के साथ-साथ शास्त्री जी ने जीवन में कई कड़वे अनुभव भी झेले। 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान उन पर झूठे आरोप लगाए गए। दिल्ली की राजनीति के प्रतिद्वंद्वियों ने उनकी छवि धूमिल करने का प्रयास किया।

हालांकि, कानून की अदालत में उन पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हो सका, लेकिन इन झूठे आरोपों ने उनके संवेदनशील मन को काफी आहत किया। इसके बावजूद, उन्होंने समाज सेवा का मार्ग नहीं छोड़ा।

उपसंहार: एक अमर विरासत
श्री धर्मदास शास्त्री एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने ‘झोपड़ी से बंगले’ तक का सफर अपनी मेहनत और काबिलियत से तय किया।

उन्होंने रैगर समाज को न केवल राजनैतिक चेतना दी, बल्कि उसे एक पहचान और आत्मसम्मान भी प्रदान किया। वे अक्सर कहा करते थे कि शिक्षा और संगठन ही उन्नति की कुंजी हैं।

16 जनवरी, 2006 को जब उनका निधन हुआ, तो केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं हुआ, बल्कि एक युग का समापन हुआ।

आज वे हमारे बीच शारीरिक रूप से विद्यमान नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा किए गए सामाजिक सुधार,ऐतिहासिक सम्मेलन और समाज को दी गई प्रतिष्ठा सदैव* जीवित रहेगी।

रैगर जाति के इतिहास में स्व० श्री धर्मदास शास्त्री का नाम सदैव सूर्य की भांति चमकता रहेगा।

शास्त्री जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बताए गए एकता और संगठन के मार्ग पर चलें और समाज के उत्थान के लिए निरंतर कार्य करते रहें।

लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES)
सामाजिक कार्यकर्ता एवं चिन्तक ब्यावर-MO.94622-60179
sohanlalsingaria@gmail.com

नोट: यह लेख श्री चन्दन मल जी नवल द्वारा रचित पुस्तक ‘रैगर जाति: इतिहास एवं संस्कृति’ के तथ्यों पर आधारित है।

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