मानव तू क्यों इंसानियत खो बैठा रे।
मृत्यु शोक में भी तू हलवा-पुड़ी खाता रे।
लाश पड़ी आंगन में, तू डोडा-अफीम मंगवाता रे।
अंतिम संस्कार होते ही हलवा का इंतजाम कराता रे।
पास-पड़ौस व पंचों को बुला कर मौसर की बात करता रे।
मानव तू क्यों
अपने स्वजन को खोने से पूरा परिवार बिलखता रे ।
तू तो खाने-पीने की मौज उड़ाना चाहता रे।
पति वियोग में अबला छाती पीट-2 के रोती रे।
तू तो चरी से घी डाल कर चूरमा बनाता रे।
मानव तू क्यों
पिता के वियोग में बेटे-बेटियाँ फूट-2 कर रोते रे।
तू तो मृत्युभोज का इंतजाम करना चाहता रे ।
भाई के देहान्त पर बहन-भाई विलाप करते रे।
तू तो पकवान खाने के लिए तरसता रे।
मानव तू क्यों
बेटे के वियोग में पूरा परिवार छाती पीट-2 कर रोता रे ।
तू तो वहाँ भी मिठाई का आनंद लेना चाहता रे।
तू तो अपने लिए डोडा-अमल का इंतजाम चाहता रे ।
तू तो मृत्युभोज का दबाव बनाना चाहता रे ।
मा: मानव तू क्यों
अरे! तेरे से तो जानवर भी कितने समझदार रे।
अपने साथी के खोने से खाना-पीना छोड़ देते रे । तू सुख-दुःख में अन्तर क्यों नहीं जानता रे। तू तो शोक में भी पकवान के लिए ललचाता रे ।
मानव तू क्यों—–
तू तो दुःख की घड़ी में भी खुरमा खाना चाहता रे । तू थोड़ी सी भी शिक्षा पशुओं से भी ले ले रे । जो साथी के बिछुड़ने से खाना-पीना छोड़ देते रे। तू शोक में भी क्यों गोंद-पाक खाना चाहता रे ।
मानव तू क्यों—–
एफ. आर. पंवार अर्ज करे मानव तुम से रे । तू मृत्युभोज खाना छोड़ दे रे । तू अपने अंदर मानवता जगा दे रे । तू सुख-दुःख का थोड़ा सा चिन्तन कर ले रे। मानव तू क्यों इंसानियत खो बैठा रे ।

-फता राम पंवार (व्याख्याता) राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय चवा बाड़मेर (राजस्थान)
मोबाइल नंबर – 9602833304
