भूमिका

भारतीय समाज की बनावट सदियों से जातिगत संरचना पर आधारित रही है। आधुनिक संविधान ने समानता का मार्ग दिखाया, परन्तु व्यवहार में आज भी अनेक जगहों पर सामाजिक असमानता कायम है। कई बार यह शोषण इतना सूक्ष्म रूप ले लेता है कि पीड़ित व्यक्ति उसे पहचान भी नहीं पाता। रिश्तों की मोहब्बत (प्रेम) और सामाजिक सिस्टम (प्रणाली) के बीच कहीं मानवता खो जाती है। वंचित समाज का व्यक्ति भावनाओं के जाल में उलझकर उस व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है जो दरअसल उसके श्रम, उसकी अस्मिता और उसकी गरिमा का उपयोग करती है। यह लेख उसी विडंबना को समझने का प्रयास है।

1:गांवों में सामाजिक संबंध अक्सर शक्ति और संसाधनों की असमानता से तय होते हैं। जिन परिवारों के पास जमीन, धन और सामाजिक प्रभाव है, वही गांव की दिशा तय करते हैं। दूसरी ओर वंचित समाज के लोग श्रम पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में कभी-कभी उन्हें सम्मान का आभास देकर काम लिया जाता है। यह एक प्रकार का एहसान (उपकार का दिखावा) बन जाता है, जबकि वास्तविकता में यह एक सामाजिक कंट्रोल (नियंत्रण) की प्रक्रिया होती है। वंचित व्यक्ति सोचता है कि उसे अपनापन मिला है, जबकि यह अपनापन कई बार केवल श्रम और सेवा प्राप्त करने का साधन बन जाता है।

2:अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बेगार प्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, बस उसका रूप बदल गया है। पहले यह खुलकर होती थी, आज इसे सामाजिक रिश्तों के आवरण में ढक दिया गया है। जब किसी वंचित व्यक्ति से बिना मजदूरी के काम कराया जाता है और बदले में थोड़ी सी इनायत (कृपा) दिखाई जाती है, तो उसे लगता है कि उसे सम्मान मिला है। पर वास्तव में यह एक प्रकार की सामाजिक मैनेजमेंट (प्रबंधन) की रणनीति होती है, जिसके माध्यम से उसे निर्भर और आज्ञाकारी बनाए रखा जाता है।

3:राखी का पवित्र पर्व भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक माना जाता है, परन्तु कुछ स्थानों पर इसे भी सामाजिक संरचना ने अपने तरीके से ढाल लिया है। उच्च जाति की महिलाएं वंचित समाज के पुरुषों को राखी बांध देती हैं और भावनात्मक रिश्ता बना देती हैं। यह रिश्ता कई बार सच्चा भी होता है, पर कई बार इसके पीछे खुलूस (सच्ची भावना) से अधिक सामाजिक नेटवर्क (संबंध-जाल) का उद्देश्य छिपा रहता है। भाई कहलाने वाला व्यक्ति फिर हर समय सेवा के लिए उपस्थित रहने की अपेक्षा से बंध जाता है।

4:इस रिश्ते का सबसे कठिन पहलू यह है कि वंचित व्यक्ति इसे पवित्र मानकर निभाता है। वह दिन-रात सेवा में लगा रहता है, चाहे खेत का काम हो, घर का छोटा-मोटा कार्य हो या किसी समारोह की तैयारी। वह सोचता है कि यह उसकी बहन का घर है। लेकिन जब वह किसी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना चाहता है, तो उसे चुप रहने की सलाह दी जाती है। उसे सब्र (धैर्य) रखने को कहा जाता है और समझाया जाता है कि गांव की पॉलिटिक्स (सत्ता-खेल) में उलझना ठीक नहीं।

5:सबसे पीड़ादायक स्थिति तब बनती है जब किसी घर में मृत्यु या बड़ा आयोजन होता है। वंचित समाज का वह व्यक्ति बारह दिनों तक परिवार के साथ बैठा रहता है, आने-जाने वालों की सेवा करता है और हर कार्य में सहयोग देता है। वह इसे अपना कर्तव्य समझता है। लेकिन भीतर ही भीतर उसे एहसास होता है कि यह सेवा उसकी सामाजिक स्थिति से जुड़ी है। उसे अदब (सम्मान) का भ्रम दिया जाता है, जबकि असल में वह एक सामाजिक सपोर्ट (सहयोग) व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है, जो बिना मजदूरी के श्रम पर आधारित है।
6:जब छुआछूत, जातिसूचक गालियों या सार्वजनिक अपमान का मामला सामने आता है और पीड़ित न्याय की उम्मीद में पुलिस के पास जाता है, तब एक और कड़वी सच्चाई सामने आती है। पुलिस जांच में कहा जाता है कि घटना की पुष्टि के लिए दो स्वर्ण समाज के गवाह चाहिए। विडंबना यह होती है कि जिन घरों में वह वर्षों तक सेवा करता रहा, जहां की महिलाओं ने उसे राखी बांधकर भाई कहा, उन्हीं के परिवार के लोग गवाही देने से पीछे हट जाते हैं। बहन कहती है—“भाई, हम कैसे बोलें, वे हमारे बराबर के लोग हैं।” शादी विवाह ईन्हीं लोगों में करना है इन्हीं से सदा के लिए बैर हो जाएगा । आप चिंता मत करो अब आगे आपके साथ ऐसा नहीं करेगा।उस पल दिल में गहरी तकलीफ़ (दर्द) और समाज की हिपोक्रेसी (पाखंड) साफ दिखाई देने लगता है।
7:सामाजिक संरचना का दबाव इतना गहरा होता है जैसे अन्य परिवार से लड़ाई झगड़ा हो, यह वंचित समाज की बहु बेटे को छेड़ दिया गया हो या उसके साथ गलत व्यवहार कर दिया जाने पर भी इनको अपना कहने वाले कई बार सत्य बोलने से लोग डरते हैं। यदि किसी घटना में गवाही देनी हो तो लोग पीछे हट जाते हैं। वे कहते हैं कि “हमारी जात के लोग नाराज हो जाएंगे।” यह बड़े बदमाश है हमारी तरफ शरीफ नहीं है मैं तो आपको भाई मानती हूं यह लोग आपसे नफरत करते हैं। यह डर सामाजिक रसूख (प्रभाव) का परिणाम होता है। ऐसी स्थिति में वंचित व्यक्ति खुद को अकेला महसूस करता है। उसे लगता है कि पूरी सिस्टम (व्यवस्था) उसके खिलाफ खड़ी है और उसकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं।

8:समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक भी है। जब किसी को वर्षों तक यह विश्वास दिलाया जाए कि वह केवल सेवा करने के लिए बना है, तो धीरे-धीरे उसकी आत्मछवि कमजोर होने लगती है। उसे लगता है कि यही उसका भाग्य है। लेकिन उसके भीतर कहीं न कहीं इंसाफ (न्याय) की चाह बनी रहती है। वह चाहता है कि समाज में ऐसी चेंज (परिवर्तन) आए जिसमें सम्मान और अधिकार केवल शब्द न हों, बल्कि वास्तविकता बनें।

9:समाज में परिवर्तन तभी संभव है जब शिक्षा, जागरूकता और संवैधानिक मूल्यों को व्यवहार में उतारा जाए। यदि हर व्यक्ति समानता को समझे और अपनाए, तो ऐसी स्थितियां धीरे-धीरे समाप्त हो सकती हैं। रिश्ते तभी पवित्र होते हैं जब उनमें स्वार्थ न हो। यदि भाई-बहन का रिश्ता है तो उसमें सच्ची वफा (निष्ठा) होनी चाहिए, न कि सामाजिक यूज़ (उपयोग) की मानसिकता।

10:वास्तव में यह समस्या किसी एक गांव या क्षेत्र की नहीं है, बल्कि एक मानसिकता की है। जब तक समाज यह नहीं समझेगा कि सम्मान किसी जाति का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर इंसान का अधिकार है, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा। हमें ऐसी संस्कृति बनानी होगी जिसमें हर व्यक्ति को इज्जत (सम्मान) मिले और लोकतांत्रिक डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) केवल संविधान की किताबों में नहीं, बल्कि गांव की चौपाल तक दिखाई दे।

समापन

अंततः प्रश्न केवल सामाजिक व्यवस्था का नहीं, बल्कि मानवता का है। जो लोग रिश्तों के नाम पर किसी का श्रम और आत्मसम्मान लेते हैं, उन्हें आत्मचिंतन करना चाहिए। समाज की असली ताकत समानता और न्याय में है। यदि हम सचमुच एक संवेदनशील राष्ट्र बनना चाहते हैं, तो हमें हर प्रकार के छिपे हुए शोषण को पहचानना होगा। तभी रिश्तों में सच्ची मोहब्बत (प्रेम) और सामाजिक प्रोग्रेस (प्रगति) का मार्ग खुलेगा। वरना इतिहास बार-बार यही कहेगा— “मरने के नाम से जो रखते थे मेरी मुंह पर उंगलियां, अफसोस वो ही मेरे दिल के कातिल निकले।”

शेर:
लानत है ऐसे ज़माने पर, जहाँ सच्चा भी ठगा जाता है,
भाई कहने वालों के शहर में इंसान तन्हा रह जाता है।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829230966

स्रोत-संदर्भ:
सामाजिक अनुभव, ग्रामीण यथार्थ, जातिगत शोषण, जनजीवन आधारित चिंतन।

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