प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को संपूर्ण विश्व ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ मनाता है। एक शिक्षाविद और सामाजिक चिंतक के नाते मेरा यह दृढ़ मत है कि यह दिन केवल रस्मी उत्सव का नहीं, बल्कि आत्म-अवलोकन का है। हमें यह विचार करना होगा कि राष्ट्र निर्माण में आधी आबादी की भागीदारी और उनके अधिकारों की वर्तमान स्थिति क्या है?
महिला सशक्तिकरण की वास्तविक नींव केवल शिक्षा और संवैधानिक अधिकारों की मज़बूत धरातल पर ही टिकी है।
बाबासाहेब का कालजयी दर्शन
आधुनिक भारत के निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का एक सुप्रसिद्ध कथन उनके
संपूर्ण सामाजिक दर्शन का केंद्र बिंदु रहा है
”मैं किसी समुदाय की प्रगति को उस समुदाय की महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति की डिग्री से मापता हूँ।”
डॉ भीमराव अम्बेडकर ने सदियों से पितृसत्तात्मक बेड़ियों, अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों में जकड़ी भारतीय नारी को कानूनी,संवैधानिक और वैचारिक स्वतंत्रता दिलाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
बाबा साहेब का मानना था कि जब तक महिलाएँ स्वतंत्र और शिक्षित नहीं होंगी, तब तक एक न्यायपूर्ण राष्ट्र की कल्पना अधूरी है।
1. संवैधानिक सुरक्षा कवच: समानता का कानूनी आधार
बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर भारतीय संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि स्वतंत्र भारत का संविधान केवल पुरुषों का दस्तावेज न बनकर ‘मानव मात्र’ का अधिकार पत्र बने।
बाबा साहेब ने संविधान के मौलिक अधिकारों में महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष खड़ा किया।
अनुच्छेद 14
यह कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करता है, जिससे यह स्थापित हुआ कि राज्य की नजर में स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं।
अनुच्छेद 15
यह लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का पूर्णतः निषेध करता है। यह अनुच्छेद सार्वजनिक स्थानों, कुओं, दुकानों और होटलों में महिलाओं के प्रवेश को कानूनी अधिकार बनाता है।
अनुच्छेद 16
यह सरकारी रोजगार में समान अवसर की गारंटी देता है, जिससे महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता के द्वार खुले।
अनुच्छेद 23
यह महिलाओं के अनैतिक व्यापार (Human Trafficking) और जबरन श्रम को दंडनीय अपराध बनाता है, जो उनकी गरिमा की
रक्षा के लिए अनिवार्य था।
अनुच्छेद 39(d)
डॉ भीमराव अम्बेडकर ने राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के तहत ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ का प्रावधान करवाया, जिसने कार्यस्थल पर आर्थिक शोषण को समाप्त
करने की नींव रखी।
2.श्रम सुधार और
कार्यस्थल पर अधिकार
बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर का योगदान केवल कागजों तक सीमित नहीं था। 1942 से 1946 के बीच ‘वायसराय की कार्यकारी परिषद’ में श्रम सदस्य रहते हुए उन्होंने कामकाजी महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव किए।
मातृत्व लाभ
बाबा साहेब ने ‘माइन्स मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट’ के जरिए महिलाओं के लिए सवैतनिक प्रसूति अवकाश की व्यवस्था की। उनका तर्क था
कि यदि कोई महिला राष्ट्र के भावी नागरिक को जन्म दे रही है, तो उसकी देखभाल करना राज्य और नियोक्ता की जिम्मेदारी है।
काम के घंटों में कमी
डॉ भीमराव अम्बेडकर ने खदानों और कारखानों में महिलाओं के काम के घंटों को निश्चित किया और उनके लिए रात्रि पाली में काम करने पर प्रतिबंध या सुरक्षा के विशेष नियम बनाए।
सुरक्षा और स्वच्छता
डॉ भीमराव अम्बेडकर ने कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए पृथक शौचालय और शिशु गृह (Crèche) जैसी सुविधाओं को अनिवार्य बनाने की वकालत की।
3. हिंदू कोड बिल
सामाजिक और पारिवारिक
न्याय का महासंग्राम
डॉ भीमराव अम्बेडकर के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद संघर्ष ‘हिंदू कोड बिल’ था। स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में डॉ भीमराव अम्बेडकर ने इस बिल का मसौदा तैयार किया, जिसका उद्देश्य हिंदू समाज की रूढ़िवादी परंपराओं को बदलकर महिलाओं को सम्मानजनक स्थान दिलाना था।
इस बिल के क्रांतिकारी बिंदु थे
उत्तराधिकार और संपत्ति
पहली बार पुत्रियों को पिता की संपत्ति में और विधवाओं को पति की संपत्ति में पूर्ण अधिकार देने का प्रस्ताव किया गया।
विवाह और तलाक: बहुविवाह को समाप्त कर एक-पत्नी व्रत (Monogamy) को अनिवार्य बनाया गया। साथ ही, प्रताड़ित महिलाओं को तलाक के जरिए नरक जैसे जीवन से मुक्ति पाने का कानूनी रास्ता दिया गया।
गोद लेने का अधिकार
महिलाओं को स्वतंत्र रूप से बच्चा गोद लेने और उसका संरक्षण (Guardianship) करने का अधिकार दिया गया।
इस बिल का तत्कालीन कट्टरपंथी समाज और संसद के भीतर भारी विरोध हुआ। बाबा साहेब इस बात से इतने मर्माहत हुए कि उन्होंने 1951 में कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा, “मेरे लिए यह बिल किसी भी अन्य कार्य से अधिक महत्वपूर्ण था।” बाद में यही बिल टुकड़ों में—हिंदू विवाह अधिनियम (1955),
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) आदि के रूप में पारित हुआ, जो आज करोड़ों महिलाओं के अधिकारों का रक्षक है।
4. शिक्षा और सामाजिक चेतना का आह्वान
बाबा साहेब का मानना था कि “शिक्षा वह शेरनी का दूध है जो पिएगा वह दहाड़ेगा।” उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं के लिए
शिक्षा को अनिवार्य माना।
बहिष्कृत हितकारिणी सभा
इस संस्था के माध्यम से डॉ भीमराव अम्बेडकर ने दलित और पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए छात्रावास और पुस्तकालय खोले।
पारिवारिक भूमिका
डॉ भीमराव अम्बेडकर ने माताओं से अपील की कि वे अपने बच्चों, विशेषकर बेटियों को शिक्षित करें। उन्होंने कहा था कि अपने बच्चों के मन में यह विश्वास पैदा करें कि वे किसी से कम नहीं हैं।
आत्मसम्मान
डॉ भीमराव अम्बेडकर ने महिलाओं को गंदे कपड़े न पहनने, अंधविश्वासों को छोड़ने और गहनों के बजाय शिक्षा पर निवेश करने की सलाह दी ताकि समाज में उनका सम्मान बढ़े।
5. राजनीतिक भागीदारी और मताधिकार
दुनिया के कई विकसित देशों (जैसे अमेरिका और स्विट्जरलैंड) में महिलाओं को मतदान के अधिकार के लिए दशकों तक संघर्ष करना पड़ा। लेकिन डॉ भीमराव अम्बेडकर की दूरदर्शिता के कारण भारतीय महिलाओं को स्वतंत्रता के साथ ही ‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार’ प्राप्त हुआ।
उनका मानना था कि जब तक महिलाएँ नीति-निर्धारण में शामिल नहीं होंगी, उनके मुद्दों का समाधान नहीं होगा। आज संसद और पंचायतों में महिलाओं की जो भागीदारी हम देख रहे हैं, उसका बीजारोपण
बाबा साहेब ने ही किया था।
6. भारतीय नारीवाद के अग्रदूत अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण
डॉ भीमराव अम्बेडकर को भारत में ‘नारीवाद’ (Feminism) का वास्तविक प्रणेता कहा जा सकता है। उनका नारीवाद केवल पश्चिमी अवधारणा की नकल नहीं था, बल्कि वह भारतीय जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के गठजोड़ पर प्रहार था।
उन्होंने स्पष्ट किया कि महिलाओं की गुलामी जातिवाद को जीवित रखने का एक साधन है। जब तक महिलाएँ अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने और निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र नहीं होंगी, तब तक जाति प्रथा का
अंत नहीं हो सकता।
7. आज के संदर्भ में प्रासंगिकता
वर्तमान समय में जब हम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ या ‘महिला आरक्षण’ की बात करते हैं, तो डॉ भीमराव अम्बेडकर के विचार ही उसका
आधार नजर आते हैं।
आर्थिक क्षेत्र
आज स्टार्टअप और कॉर्पोरेट जगत में महिलाओं की बढ़ती संख्या उनके द्वारा दिलाए गए संपत्ति और शिक्षा के अधिकार का परिणाम है।
सुरक्षा
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के कानून (POSH Act) की आत्मा डॉ भीमराव अम्बेडकर के श्रम सुधारों में बसती है।
राजनीति
हाल ही में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण बिल) वास्तव में बाबा साहेब के उसी सपने की पूर्ति है जहाँ वे महिलाओं को नेतृत्व करते देखना चाहते थे।
निष्कर्ष
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने महिलाओं को केवल अधिकार ही नहीं दिए, बल्कि उन्हें एक ‘पहचान’ और ‘आवाज’ दी। उन्होंने महिलाओं को ‘भोग की वस्तु’ या ‘अबला’ की छवि से बाहर निकालकर एक ‘स्वतंत्र नागरिक’ के रूप में स्थापित किया।
उन्होंने सिखाया कि अन्याय सहना पाप है और अपने हक के लिए
लड़ना धर्म है।
आज भारतीय नारी जिस गौरव के साथ अंतरिक्ष से लेकर सीमा तक अपना परचम लहरा रही है, उस सफलता की हर कहानी में बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर के संघर्ष का एक अंश शामिल है। उनके योगदान को केवल याद करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक ऐसा समाज बनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी जहाँ लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न हो और हर महिला भयमुक्त होकर अपने सपनों की उड़ान भर सके।
लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य RES
सामाजिक कार्यकर्ता एवं चिन्तक ब्यावर-M-94622-60179
sohanlalsingaria@gmail.com
