(1)भारतीय समाज की संरचना में वंचित समुदाय की पीड़ा किसी छिपी हुई कहानी नहीं, बल्कि खुली हुई सच्चाई है। सदियों पुरानी जातिगत व्यवस्था ने उनके जीवन को इस तरह जकड़ लिया है कि संघर्ष ही उनकी नियति बन गया है। समाज की व्यवस्था में एक अजीब सा इंसाफ़ (न्याय) का अभाव दिखाई देता है, जहाँ बराबरी के अवसर केवल कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं। आधुनिक समय में विकास और प्रोग्रेस (उन्नति) की बात तो बहुत होती है, परंतु वंचित वर्ग के हिस्से में अक्सर केवल वादे ही आते हैं। संसाधनों का वितरण इस तरह से हुआ है कि संपन्न वर्ग के पास साधन और अधिकार दोनों हैं, जबकि वंचितों के पास केवल मेहनत और उम्मीद बची रहती है। यही कारण है कि उनका जीवन संघर्ष की लंबी यात्रा बनकर रह जाता है।
(2)गरीबी केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह आत्मसम्मान और जीवन के अवसरों को भी प्रभावित करती है। एक मजदूर या निम्न आय वाला व्यक्ति सुबह से शाम तक मेहनत करता है, लेकिन महीने के अंत तक उसके हाथ में कुछ भी नहीं बचता। महंगाई और बेरोज़गारी ने उसकी कमर तोड़ दी है। वह कभी-कभी अपने जीवन की स्थिति को देखकर भीतर ही भीतर मायूसी (निराशा) से भर जाता है। समाज में आर्थिक सिस्टम (प्रणाली) इस तरह काम करता है कि जो पहले से मजबूत है, वही और मजबूत होता चला जाता है, जबकि कमजोर और भी कमजोर हो जाता है। यही कारण है कि वंचित समाज के लोग अपने जीवन को संभालने के लिए लगातार संघर्ष करते रहते हैं।
(3)वंचित परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर होती है कि उनकी आय का अधिकांश हिस्सा केवल बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में ही समाप्त हो जाता है। जो थोड़ा बहुत कमाते हैं, वह राशन, किराया और बच्चों की फीस में खत्म हो जाता है। महीने की पाँच तारीख आते-आते उनकी जेब खाली हो जाती है। इस स्थिति में भी वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए उम्मीद बनाए रखते हैं। उनके जीवन में कभी-कभी सुकून (शांति) का एक छोटा सा पल भी बहुत बड़ी राहत बन जाता है। लेकिन आज की आर्थिक इकोनॉमी (अर्थव्यवस्था) में बढ़ती असमानता उनके लिए जीवन को और कठिन बना देती है।
(4)गरीबी के साथ सबसे बड़ा संघर्ष स्वास्थ्य से जुड़ा होता है। जब परिवार में कोई बीमार हो जाता है, तो वह परिवार की पूरी आर्थिक व्यवस्था को हिला देता है। बूढ़ी मां की बीमारी का इलाज शुरू होता है तो कभी बच्चे की तबीयत खराब हो जाती है। दवाइयों और अस्पताल के खर्चे के बीच उनका जीवन उलझ जाता है। ऐसी परिस्थितियों में इंसान के भीतर एक गहरी बेचैनी (अशांति) पैदा हो जाती है। स्वास्थ्य सेवाओं का मौजूदा हेल्थकेयर (स्वास्थ्य सेवा तंत्र) भी गरीबों के लिए अक्सर महंगा और दूर की चीज़ बनकर रह जाता है। परिणामस्वरूप वे अपनी पीड़ा को चुपचाप सहते रहते हैं।
(5)समाज में त्योहार खुशियों का प्रतीक होते हैं, लेकिन वंचित परिवारों के लिए कई बार यह भी एक परीक्षा बन जाते हैं। वे जानते हैं कि यदि बच्चे त्योहार के दिन खुश न हों, तो उनके मन में हीनता की भावना पैदा हो सकती है। इसलिए वह जैसे-तैसे थोड़े पैसे उधार लेकर त्योहार मना लेते हैं। उस समय उनके दिल में एक छोटी सी खुशी (आनंद) जरूर होती है, लेकिन साथ ही कर्ज का बोझ भी बढ़ जाता है। आधुनिक उपभोक्तावादी कल्चर (संस्कृति) ने समाज में तुलना और दिखावे को बढ़ा दिया है, जिससे गरीबों पर मानसिक दबाव और भी बढ़ जाता है।
(6)वंचित समाज में बेटियों के भविष्य को लेकर चिंता बहुत जल्दी शुरू हो जाती है। जैसे ही बच्ची दस या बारह वर्ष की होती है, माता-पिता के मन में उसकी शादी की चिंता घर कर जाती है। गरीबी और सामाजिक दबाव मिलकर उन्हें जल्दी निर्णय लेने के लिए मजबूर कर देते हैं। ऐसे समय में माता-पिता के मन में एक गहरी फिक्र (चिंता) पैदा हो जाती है। शिक्षा और जागरूकता का एजुकेशन (शिक्षा) तंत्र अभी भी हर गांव और हर गरीब परिवार तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाया है। यही कारण है कि कई परिवार आज भी पुरानी परंपराओं और मजबूरियों के बीच जीवन जी रहे हैं।
(7)समय के साथ-साथ शरीर भी संघर्ष की कीमत चुकाने लगता है। कुपोषण और लगातार मेहनत के कारण कई लोग समय से पहले बूढ़े हो जाते हैं। जब तक वे बच्चों की पढ़ाई और शादी की जिम्मेदारियों से मुक्त होते हैं, तब तक उनकी सेहत कमजोर हो चुकी होती है। उस समय उनके मन में जीवन के प्रति एक अजीब सी तन्हाई (अकेलापन) महसूस होने लगता है। समाज में मौजूद सोशल (सामाजिक) असमानताएँ उन्हें यह एहसास दिलाती हैं कि वे हमेशा पीछे ही रह गए।
(8)इन सब संघर्षों के बीच वंचित समाज का जीवन धीरे-धीरे अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ता है। जीवन भर संघर्ष करने के बाद भी उन्हें अक्सर सम्मान और सुरक्षा नहीं मिल पाती। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे समाज की हकीकत (सच्चाई) बन चुकी है। यदि हम एक न्यायपूर्ण और समावेशी डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) बनाना चाहते हैं, तो हमें वंचित वर्ग की समस्याओं को गंभीरता से समझना होगा। जब तक समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को सम्मान और अवसर नहीं मिलेगा, तब तक विकास अधूरा ही रहेगा।
समापन शेर :
जिनके हिस्से धूप ही धूप और सफ़र की थकान आई,
उनकी आँखों में भी इक दिन खुशियों की सुबह आए।
समापन शेर :
जिनके हिस्से धूप ही धूप और सफ़र की थकान आई,
उनकी आँखों में भी इक दिन खुशियों की सुबह आए।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
स्रोत एवं संदर्भ :
दलित अध्ययन, समाजशास्त्र शोध, अम्बेडकर साहित्य, जनगणना, आर्थिक सर्वेक्षण।
